केंद्र की मोदी सरकार मानो एक डूबता जहाज बन चुकी है। नीट परीक्षा के पेपर लीक और छात्रों की आत्महत्याओं के विरोध में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली में छात्रों का उग्र आंदोलन सुलग ही रहा था कि इसी बीच देश के उद्योगपतियों द्वारा कर्ज डकारने (एनपीए) के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ गए हैं। देश के बड़े उद्योगपतियों द्वारा विभिन्न बैंकों से लिया गया रु. ७.७५ लाख करोड़ का भारी-भरकम कर्ज `डूबत खाते’ में चला गया है। और हैरान करने वाली बात यह है कि सरकारी बैंकों को चूना लगाने वाले ये कर्जदार कौन हैं, उनके नाम सार्वजनिक करने से सरकार ने साफ इनकार कर दिया है। आखिर ये सारे महा-ठग सरकार के क्या लगते हैं? देश के सरकारी बैंकों के खजाने की बेखौफ लूट मचाकर कर्ज न चुकाने वाले ये उद्योगपति आखिरकार हैं कौन? यह देश की आम जनता को पता चलना ही चाहिए। कर्ज लेकर उसे डकार जाने वाले उद्योगपतियों की `फर्जी प्रतिष्ठा’ को बचाने के पीछे सरकार की क्या मंशा है? वर्ष २०१४-१५ से २०२५-२६ के इन १२ सालों में बड़े कॉर्पोरेट समूहों और सर्विस सेक्टर की कंपनियों ने सरकारी बैंकों से बेहिसाब कर्ज उठाए। इनमें से करीब रु. ७.७५ लाख करोड़ के कर्ज अब बैंकों ने `डूबत-खाते’ में डाल दिए हैं। केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने खुद लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में ये आंकड़े दिए हैं, इसलिए यह जानकारी पूरी तरह से आधिकारिक है। वित्त राज्यमंत्री ने बताया कि रु. १०० करोड़ या उससे अधिक के कर्ज वाले कुल १,२४९ कर्जदार हैं, जो सभी डिफॉल्टर हैं। इन उद्योगपतियों और कारोबारियों का कुल रु. ७.७५ लाख करोड़ का
कर्ज डूबत-खाते में
चला गया है और इनमें से अब तक केवल रु. ३.१० लाख करोड़ की ही वसूली हो सकी है। बाकी बची रकम को `राइट ऑफ’ कर दिया गया है। `राइट-ऑफ का मतलब है कि वह रकम जिसकी वसूली नहीं हो पाई। इसे कर्जमाफी नहीं कहा जा सकता।’ सरकार ने बैंकों की तरफ से लोकसभा में यह दलील दी है। यह तर्क बेहद चौकाने वाला और ढकोसला है! सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार बैंकों में `वित्तीय अनुशासन’ लाने का ढिंढोरा पीटती रही है। तो फिर बड़े उद्योगपतियों द्वारा बैंकों पर इस तरह का डाका डालने के बावजूद, कर्ज की वसूली किए बिना उसे चुपचाप डूबत-खाते में डाल देना किस `वित्तीय अनुशासन’ में आता है? आम गरीब या मध्यम वर्ग का व्यक्ति अगर छोटे-मोटे धंधे, बाइक, ऑटो, कार, घर या छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए लाख-दो लाख का कर्ज ले ले, तो बैंक वसूली के लिए उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। गाड़ियां जब्त कर ली जाती हैं। होम लोन की किस्तें रुकी नहीं कि घर की कुर्की की कार्रवाई शुरू हो जाती है, ताले ठोक दिए जाते हैं। कर्जदार किसानों को तो बैंक आत्महत्या करने पर मजबूर कर देते हैं। तो फिर कर्ज वसूली का यही न्याय सैकड़ों-हजारों करोड़ का कर्ज डकारने वाले इन बड़े उद्योगपतियों पर लागू क्यों नहीं होता? उनके आलीशान बंगलों, गाड़ियों और जायदाद को जब्त करने की कार्रवाई क्यों नहीं होती? कुर्की या ताला ठोकने की बात तो छोड़िए, इन `महा-डिफॉल्टरों’ के नाम तक उजागर करने को न तो बैंक तैयार हैं और न ही सरकार! रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अधिनियम ४५ का हवाला देकर सरकार लोकसभा में जवाब देती है कि इन बड़े डिफॉल्टरों की
जानकारी `गोपनीय’
है, इसलिए इन उद्योगपतियों या कंपनियों के नाम उजागर नहीं किए जा सकते। इसे क्या कहा जाए? एक तरफ तो दिन-रात `समान नागरिक संहिता’ के नाम पर गला फाड़ा जाता है, और दूसरी तरफ छोटे कर्जदारों और बड़े कर्जदारों के बीच ऐसा दोहरा रवैया अपनाया जाता है! यह वैâसा `समान कानून’ है? अखबारों में विज्ञापन देकर छोटे डिफॉल्टरों की लिस्ट नाम-पते के साथ छापी जाती है और जो उद्योगपति बैंकों को कंगाली के कगार पर धकेल देते हैं, उनके नाम छिपाकर रखे जाते हैं। इस पक्षपात के पीछे आखिर कौन-सी सांठगांठ है? क्या हजारों करोड़ के ये डिफॉल्टर सत्ताधारी पार्टी के चंदादाता हैं? क्या मोदी सरकार ने `चंदा दो, कर्जमाफी लो’ जैसी कोई नीति बना रखी है? पिछले १२ सालों के मोदी राज में हजारों करोड़ का कर्ज लेने वाले बड़े उद्योगपतियों ने बैंकों को जबरदस्त चूना लगाया है। `अथाह कर्ज लो, थोड़ा-बहुत चुकाओ और बाकी डकार जाओ’, इसे तो मानो सरकारी मान्यता ही मिल गई है। सरकार द्वारा ही दी गई ताजा जानकारी के मुताबिक, रु. ७.७५ लाख करोड़ के बारह सौ से अधिक कर्ज खातों को बैंकों ने बट्टे खाते में डाल दिया है। फिर भी बैंकों के खजाने पर डाका डालने वाले ये `महा-डिफॉल्टर’ कौन हैं, इसकी जानकारी `गोपनीय’ बताकर सरकार नाम उजागर करने से मना कर रही है। यह बेहद उद्वेलित करने वाला और गुस्सा दिलाने वाला है। सरकार आखिर ये नाम क्यों छिपा रही है? इसके पीछे किसको बचाने का मकसद है? असलियत तो यह है कि उद्योग जगत के ठगों और सरकार के महा-ठगों की मिलीभगत से बैंकों की खुली लूट जारी है। गरीब-सामान्य `कॉकरोच’ पेट काटकर कर्ज की किस्तें भरे और अमीर, अरबपति बैंकों को चूना लगाएं, देश में कर्ज डकारने का ऐसा `अमृतकाल’ चल रहा है। जब सरकार ही साथ खड़ी हो, तो जनता के पैसे पर डाका डालने वाले इन लुटेरों को भला कौन रोकेगा?
