-पीडब्ल्यूडी के ‘प्राइवेट सर्वे’ पर बवाल
-सरकारी मुहर के लिए सीधे
-मुख्यमंत्री कार्यालय से दबाव!
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र में सार्वजनिक निर्माण विभाग की सड़क, पुल और अन्य विकास परियोजनाओं को लेकर एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि जिन परियोजनाओं के लिए वर्षों पहले किसानों और निजी जमीनों का उपयोग किया गया, उनकी वैधानिक प्रक्रिया पूरी करने के बजाय अब निजी एजेंसियों से सर्वे कराकर उन नक्शों पर सरकारी मुहर लगवाने की कोशिश की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, भूमि अभिलेख विभाग से नियमानुसार सरकारी माप-जोख कराने के बजाय निजी एजेंसियों द्वारा तैयार किए गए नक्शों को ही सरकारी मान्यता दिलाने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि पूरी सरकारी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला हो सकता है।
बताया जा रहा है कि राज्य के कई हिस्सों में सड़क, पुल और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जमीन का उपयोग तो कर लिया गया, लेकिन अनेक मामलों में न तो विधिवत सीमांकन हुआ और न ही अधिकृत माप-जोख की प्रक्रिया पूरी की गई। अब वर्षों बाद निजी एजेंसियों से सर्वे कराकर उसी पर सरकारी हस्ताक्षर और मुहर लेने की कोशिश किए जाने की चर्चा प्रशासनिक हलकों में है।
सूत्रों का दावा है कि नासिक जिले में एक निजी एजेंसी द्वारा तैयार किए गए सर्वे नक्शों पर भूमि अभिलेख विभाग ने सरकारी हस्ताक्षर और मुहर लगाने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद कथित तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय से जिला स्तर के अधिकारियों को फोन कर इन नक्शों को मंजूरी देने के लिए दबाव बनाया गया।
जानकारी के मुताबिक जिला प्रशासन स्तर पर भी इस मामले को सुलझाने की कोशिश हुई, लेकिन भूमि अभिलेख विभाग के अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए अपनी आपत्ति वापस लेने से इनकार कर दिया।
सरकारी राजस्व को नुकसान?
भूमि अभिलेख विभाग के माध्यम से होने वाली अधिकृत माप-जोख पर सरकार को निर्धारित शुल्क प्राप्त होता है। लेकिन यदि निजी एजेंसियों के सर्वे को ही सरकारी मान्यता दी जाती है, तो इससे न केवल सरकारी राजस्व प्रभावित हो सकता है, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता भी सवालों के घेरे में आ सकती है। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि इस पूरे मामले के पीछे करोड़ों रुपये के आर्थिक हित जुड़े हो सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल…
यदि सरकारी माप-जोख की जिम्मेदारी भूमि अभिलेख विभाग की है, तो निजी एजेंसियों द्वारा तैयार नक्शों को सरकारी वैधता दिलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या सार्वजनिक निर्माण विभाग ने पहले निर्माण कार्य पूरे किए और अब दस्तावेजों को नियमों के अनुरूप दिखाने की कोशिश की जा रही है? और सबसे अहम सवाल, क्या मुख्यमंत्री कार्यालय का नाम लेकर अधिकारियों पर दबाव बनाया गया? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह मामला महाराष्ट्र में सार्वजनिक निर्माण कार्यों और सरकारी भूमि प्रबंधन से जुड़े सबसे बड़े प्रशासनिक विवादों में शामिल हो सकता है।
