विजयशंकर चतुर्वेदी
भारत का सबसे बड़ा सामाजिक और आर्थिक विरोधाभास यह है कि एक ओर देश वैश्विक आर्थिक मंचों पर अपनी उच्च विकास दर का परचम लहरा रहा है तो दूसरी ओर इसकी विशाल जनरेशन जेड (जेन जी) आबादी अपनी शिक्षा के अनुरूप रोजगार पाने के लिए अभूतपूर्व संघर्ष कर रही है। उत्तर प्रदेश का एक इंजीनियर आज खाद्य सामग्री की डिलिवरी कर रहा है। महाराष्ट्र की एक स्नातकोत्तर छात्रा पिछले तीन वर्षों से केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगी है। ये उदाहरण उस पीढ़ी की सामूहिक तस्वीर हैं, जिसे डिग्रियां तो मिलीं, अवसर नहीं। स्पष्ट है कि भारत की बेरोजगारी की समस्या केवल नौकरियों की संख्यात्मक कमी नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा प्रणाली और श्रम बाजार की प्राथमिकताओं के बीच गहराता ढांचागत असंतुलन है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब लाखों स्वीकृत सरकारी पद वर्षों तक रिक्त पड़े रहते हैं और भर्ती प्रक्रियाएं घोटालों, कानूनी दांव-पेंच तथा प्रशासनिक देरी का शिकार हो जाती हैं।
डिग्रियों का अंबार और हुनर का सूखा
उपलब्ध श्रम सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी की दर कम शिक्षित श्रमिकों के मुकाबले अधिक है। उद्योग जगत के विभिन्न आकलन बताते हैं कि इंजीनियरिंग, प्रबंधन और सामान्य स्नातकों का बड़ा हिस्सा रोजगार योग्य नहीं माना जाता। शिक्षा संस्थानों का ध्यान व्यावहारिक कौशल, शोध और आलोचनात्मक सोच विकसित करने के बजाय केवल परीक्षा उत्तीर्ण कराने और डिग्रियां बांटने तक सीमित रह गया है। इसी का परिणाम है कि युवा वर्षों तक औपचारिक नौकरियों की प्रतीक्षा करते हुए असंख्य प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्रव्यूह में उलझे रहते हैं, जिससे उनकी रचनात्मक ऊर्जा का ह्रास होता है।
रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की अनुपस्थिति
भारतीय अर्थव्यवस्था में नए पैदा होनेवाले अधिकांश रोजगार असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र में केंद्रित हैं। गिग अर्थव्यवस्था, जिसमें डिलिवरी, ऐप आधारित सेवाएं और अल्पकालिक अनुबंध शामिल हैं, ने युवाओं को तात्कालिक आय का साधन तो दिया है, लेकिन इसमें न तो न्यूनतम वेतन की गारंटी है और न ही पेंशन या स्वास्थ्य बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा। जनरेशन जेड का बड़ा हिस्सा ऐसी नौकरियों में फंसने के लिए मजबूर है, जहां न तो करियर में प्रगति का कोई स्पष्ट मार्ग है और न ही भविष्य की स्थिरता। उच्च योग्यतावाले स्नातकों का ऐसे कार्यों तक सीमित रह जाना देश की मानव पूंजी का गंभीर क्षरण है।
महिलाओं की सीमित भागीदारी का असर
उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में लड़कियां अक्सर लड़कों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, लेकिन जब बात औपचारिक नौकरियों में प्रवेश की आती है, तो यह आंकड़ा अचानक गिर जाता है। सामाजिक रूढ़िवादिता, कार्यस्थलों पर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे, मातृत्व के बाद करियर में आनेवाले अंतराल और दूरदराज के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी के कारण करोड़ों शिक्षित महिलाएं श्रम शक्ति से बाहर बनी हुई हैं। यदि भारत अपने श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी को पुरुषों के समकक्ष ले आए, तो देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कई प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। शिक्षित महिलाओं का कार्यबल से बाहर रहना केवल लैंगिक असमानता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता की भी क्षति है।
प्रोत्साहन से आगे बढ़कर संस्थागत निर्माण
रोजगार के संकट को दूर करने के लिए प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च अनुसंधान तक पूरी व्यवस्था को पुनर्गठित करना होगा। भारत के विनिर्माण क्षेत्र, कपड़ा उद्योग और उभरते हुए हरित ऊर्जा व इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों में अपार संभावनाएं मौजूद हैं, बशर्ते इन उद्योगों को आधुनिक तकनीक और वैश्विक आपूर्ति शृंखला के अनुरूप तैयार किया जाए। विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाकर ही बड़ी संख्या में मध्यम-कुशल नौकरियों का सृजन किया जा सकता है। सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर व्यावसायिक प्रशिक्षण को मुख्यधारा की शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा, ताकि युवा स्नातक बनने के साथ-साथ किसी न किसी हुनर में दक्ष होकर श्रम बाजार में आत्मविश्वास के साथ कदम रख सकें।
भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा हैं। यदि यह पीढ़ी अपनी शिक्षा के अनुरूप अवसरों से वंचित रह गई तो जनसांख्यिकीय लाभांश जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है। इसलिए रोजगार को केवल आर्थिक नीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की केंद्रीय परियोजना के रूप में देखना होगा, जहां शिक्षा, उद्योग और सामाजिक सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक बनें।
(लेखक सामाजिक-आर्थिक विषयों और नीतिगत मुद्दों के स्वतंत्र विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)
