प्रकृति की गोद में आंखें खोली,
प्रकृति से ही जीवन पाया।
वायु, जल, ऊर्जा, पृथ्वी, आकाश,
पांच तत्वों से बनी हमारी काया।
मां सा प्यार मिलता था जिससे,
वह कुपित होकर क्यों रुलाया?
क्यों रूठ गए वरुण देव,
मेघों से अविरल जल बरसाया।
डूब गए खेत-खलिहान, पशु,
मानव, सड़क, गांव, बस्तियां, शहर।
पर्वतों पर हो रही कटान से बह गए,
वृक्ष, झाड़, जंगल, कानन।
तोड़ दिए सब तटबंध,
ताल, पोखर, नदी, नालों, झीलों ने।
सूखे पत्तों समान बह गए,
अनगिनत गांव, चौपाये, मानव।
गरजते-बरसते काले मेघों ने,
मचाई प्रलय जबरदस्त।
कड़कड़ाती दामिनी ने दृश्य दिखाए भयंकर।
बहुत खिलवाड़ हो रहा है प्रकृति से,
कट रहे वन,
साधनों का अनुचित, असुरक्षित दोहन।
पाप-ताप बढ़ गया धरा पर,
तभी रौद्र रूप अपनाया।
कहीं सूखे से अंकुरित हो न पाई धरा,
कहीं बह गए लहलहाते खेत।
कभी अकाल, बाढ़, भूकंप,
कभी राष्ट्रों की युद्ध-विभीषिकाएं।
जब मानव स्वयं न समझ पाए,
प्रकृति समझाने चली आए।
-बेला विरदी
