अरुण कुमार गुप्ता
प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक पर सख्त कानून, जेल की सजा अवधि बढ़ाने की तैयारी, करोड़ों रुपए के जुर्माने का प्रस्ताव और तेज जांच के दावे से मोदी सरकार ने संदेश दिया है कि परीक्षा माफियाओं के खिलाफ अब कठोर कार्रवाई होगी। हाल ही में संसद में कानून को और सख्त बनाने के लिए संशोधन भी लाया गया है।
लेकिन असली सवाल यह है कि यदि कानून इतना कठोर है, तो पेपर लीक की घटनाएं रुक क्यों नहीं रहीं? हाल ही में सीबीआई ने नीट-यूजी पेपर लीक मामले में १३ आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया। वहीं, देशभर में भर्ती और परीक्षा अनियमितताओं से जुड़े १५८ मामले अब भी अदालतों में लंबित बताए जा रहे हैं, जिनके लिए सीबीआई ने फास्ट-ट्रैक सुनवाई की मांग की है। यह केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट बन चुका है। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च करता है, लेकिन जब परीक्षा रद्द होती है तो सबसे बड़ा नुकसान उस अभ्यर्थी का होता है जिसने पूरी ईमानदारी से मेहनत की थी। उसके समय, अवसर और मानसिक तनाव की भरपाई कोई कानून नहीं कर सकता। पेपर लीक अब किसी एक व्यक्ति का अपराध नहीं रह गया है। यह कई मामलों में संगठित नेटवर्क का रूप ले चुका है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, बिचौलिये, परीक्षा से जुड़े लोग और अन्य सहयोगी शामिल हो सकते हैं।
दंड बढ़ाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं
सवाल यह भी है कि हर बड़े घोटाले के बाद नए कानून की घोषणा होती है, लेकिन परीक्षा प्रणाली की बुनियादी कमियां, डिजिटल सुरक्षा, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, समयबद्ध जांच और त्वरित न्याय प्रणाली नहीं सुधरती हैं। यदि इन मोर्चों पर बदलाव नहीं हुआ तो केवल दंड बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान कठिन होगा। युवाओं का भरोसा केवल कठोर कानून से नहीं लौटेगा। भरोसा तब लौटेगा जब परीक्षा समय पर होगी, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा, दोषियों को महीनों नहीं बल्कि समयबद्ध प्रक्रिया में सजा मिलेगी और ईमानदार अभ्यर्थी को यह विश्वास होगा कि उसकी मेहनत किसी संगठित गिरोह के सामने नहीं हारेगी।
परीक्षा प्रणाली में सुधार जरूरी
देश की सबसे बड़ी पूंजी उसका युवा है। यदि प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहे, तो नुकसान केवल लाखों अभ्यर्थियों का नहीं होगा, बल्कि शासन व्यवस्था और सार्वजनिक संस्थानों की विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी होगी। इसलिए यह समय केवल सख्त कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा प्रणाली बनाने का है जिस पर छात्र बिना किसी संशय के भरोसा कर सकें।
