मुख्यपृष्ठनए समाचारनासिक के ‘पालकमंत्री' पद की दौड़ से भुजबल का यू-टर्न!

नासिक के ‘पालकमंत्री’ पद की दौड़ से भुजबल का यू-टर्न!

 -आखिर किसके दबाव में बदले तेवर?
-सियासी गलियारों में बढ़ी दबाव की चर्चा

सुनील ओसवाल / मुंबई

नासिक के पालकमंत्री पद को लेकर एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति गरमा गई है। जिन छगन भुजबल को अब तक इस पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था, उन्हीं भुजबल ने अचानक अपने समर्थकों द्वारा लगाए गए पोस्टरों से सार्वजनिक रूप से दूरी बना ली। इतना ही नहीं, उन्होंने पोस्टर हटाने के निर्देश देकर साफ संकेत दे दिया कि फिलहाल वे इस दौड़ में आगे बढ़ने के इच्छुक नहीं हैं। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भुजबल को अचानक बैकफुट पर आना पड़ा?
नासिक में सड़कों पर बढ़ते गड्ढों और लगातार हो रहे हादसों के बीच राष्ट्रवादी युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शहरभर में पोस्टर लगाकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मांग की थी कि ‘भुजबल को पालकमंत्री बनाइए और नासिक को गड्ढामुक्त कीजिए।’ राजनीतिक हलकों में इसे भुजबल की दावेदारी को मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा था।
पूरा घटनाक्रम तब बदल गया, जब खुद छगन भुजबल ने इन पोस्टरों पर नाराजगी जताते हुए उन्हें तत्काल हटाने का आदेश दे दिया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि नासिक की बदहाल सड़कों का मुद्दा जनता का है, इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें पालकमंत्री बनाया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि पोस्टर लगाने वालों तक अपनी नाराजगी पहुंचा दी गई है और सभी पोस्टर हटवा दिए गए हैं। भुजबल लंबे समय से नासिक के पालकमंत्री पद के इच्छुक माने जाते रहे हैं। उन्होंने पहले भी संकेत दिए थे कि यदि उन्हें पालकमंत्री बनाया जाए तो केवल नासिक जिले का ही प्रभार स्वीकार करेंगे।
इसी कारण उन्होंने अन्य जिलों का पालकत्व लेने में भी रुचि नहीं दिखाई थी। ऐसे में अचानक बदला उनका रुख कई सवाल खड़े कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत फैसला नहीं हो सकता। नासिक में फिलहाल कुंभमेला मंत्री गिरीश महाजन सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और उन्हें ही अघोषित पालकमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे माहौल में भुजबल की दावेदारी भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती थी। इसलिए चर्चा है कि क्या महायुति के भीतर राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए भुजबल को पीछे हटने की सलाह दी गई? हालांकि, न तो भाजपा और न ही राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक टिप्पणी की गई है, लेकिन भुजबल के अचानक बदले रुख ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पैâसला पूरी तरह स्वेच्छा से लिया गया या फिर इसके पीछे सत्ता और गठबंधन की मजबूरियों का दबाव काम कर रहा है? आने वाले दिनों में नासिक के पालकमंत्री पद पर होने वाला पैâसला इस पूरे घटनाक्रम की असली तस्वीर सामने ला सकता है।

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