-पुरुष प्रधान मानसिकता के आगे फिर लाचार दिखी महिला
-रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था भी कठघरे में
जेदवी
मुंबई की पहचान कही जाने वाली लोकल ट्रेन केवल सफर का जरिया नहीं, बल्कि इस शहर की संवेदनशीलता और संस्कारों का आईना भी मानी जाती है। लेकिन ३१ जुलाई की रात घटी एक घटना ने इस आईने पर कई सवाल खड़े कर दिए। गोद में मासूम बच्चे को लेकर सफर कर रही एक महिला खुद को अचानक ऐसी भीड़ के बीच घिरी हुई पाती है, जहां सहानुभूति की जगह ताने मिले, मदद की जगह बहस हुई और इंसानियत भी भीड़ में कहीं खोती नजर आई।
जानकारी के अनुसार, रात ११ बजे के बाद फर्स्ट क्लास महिला डिब्बे का आधा हिस्सा सामान्य यात्रियों के लिए खोल दिया जाता है। बताया गया कि संबंधित महिला इस नियम से अनजान थी और दादर स्टेशन से उसे महिला डिब्बा समझकर उसमें सवार हो गई। जैसे ही उसने भीड़ देखकर आपत्ति जताई, माहौल तनावपूर्ण हो गया। आरोप है कि कई पुरुष यात्रियों ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे घेर लिया, व्यंग्य किए और गोद में छोटे बच्चे के बावजूद न बैठने की जगह दी और न ही सुरक्षित खड़े रहने की गुंजाइश छोड़ी।
सबसे पीड़ादायक सवाल यही है कि क्या हमारी संवेदनाएं इतनी कमजोर हो चुकी हैं कि गोद में मासूम बच्चे को लिए एक मां के लिए दो कदम पीछे हटना भी लोगों को मंजूर नहीं? नियमों की दुहाई देने वाले क्या इंसानियत का सबसे बुनियादी नियम भी भूल चुके हैं? भीड़ में सबसे पहले संवेदना ही दम तोड़ती है और इस घटना ने यही कड़वी सच्चाई सामने ला दी।
बताया गया कि डिब्बे में मौजूद दो महिला यात्रियों ने उसका साथ देने का प्रयास किया। एक महिला पुलिस कांस्टेबल ने भी स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन उनकी बात भी कथित तौर पर अनसुनी कर दी गई। अंतत: रेलवे कंट्रोल रूम को सूचना देनी पड़ी। इसके बाद बोरीवली स्टेशन पर पुलिस ने महिला और उसके बच्चे को सुरक्षित उतारकर मीरा रोड स्टेशन से महिला डिब्बे में बैठाया। सवाल यह है कि जब एक महिला पुलिसकर्मी की मौजूदगी में भी हालात नहीं संभले, तो आम महिला यात्री खुद को कितना सुरक्षित महसूस करेगी?
महिलाओं की मांग-आधा नहीं, पूरा फर्स्ट क्लास महिला कोच रहे २४ घंटे आरक्षित!
इस घटना के बाद महिला यात्रियों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि रात ११ बजे के बाद फर्स्ट क्लास महिला डिब्बे का आधा हिस्सा सामान्य यात्रियों के लिए खोलने की व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उनका अनुभव है कि रात ११ बजते ही बड़ी संख्या में पुरुष यात्री उसी हिस्से में चढ़ जाते हैं, जिससे पहले से सफर कर रही महिलाएं असहज, असुरक्षित और भयभीत महसूस करती हैं। महिलाओं का स्पष्ट कहना है कि फर्स्ट क्लास महिला कोच को २४ घंटे पूरी तरह महिलाओं के लिए ही आरक्षित रखा जाए।
