-एफआईआर सिस्टम फेल, लापरवाही, लेटलतीफी जारी
-डबल इंजन सरकार, जीरो पारदर्शिता
-सायबर सेल पर भी उठे सवाल
फिरोज खान / मुंबई
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को १३ साल बीत चुके हैं, लेकिन राज्य के गृह विभाग के अधीन आनेवाले मुंबई पुलिस स्टेशनों में आज भी एफआईआर की तत्काल अपलोडिंग और पारदर्शिता को लेकर गंभीर खामियां हैं। शिकायतकर्ता को एफआईआर की कॉपी न देना, जांच में जानबूझकर देरी और सीसीटीवी फुटेज का गायब होना रोज की बात बन गई है।
मुंबई हाई कोर्ट ने हाल ही में पुलिस की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी करते हुए डीजीपी को पूरे राज्य में समीक्षा करने के आदेश दिए हैं। इससे साफ है कि मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस के विभाग में निगरानी पूरी तरह फेल है। २०१३ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलते ही एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। प्री-एफआईआर जांच १५ दिन से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हर शिकायत की एंट्री होनी चाहिए। अगर शिकायत बंद की जाती है तो १ हफ्ते में शिकायतकर्ता को कारण सहित कॉपी देनी होगी। लेकिन गृह विभाग की निगरानी न होने से ये आदेश आज भी लागू नहीं हो पाए।
३ बड़े खुलासे जो सरकार की पोल खोलते हैं
मुंबई हाई कोर्ट ने पुलिस को ‘जानबूझकर’ जांच न करने पर फटकार लगाई। ११ सितंबर २०२३ की एफआईआर में २१ महीने तक एक भी गवाह का बयान नहीं लिया गया। कोर्ट ने कहा यह ‘आरोपी को फायदा पहुंचाने के लिए लापरवाही’ है।
सीसीटीवी फुटेज गायब
घाटकोपर पुलिस स्टेशन में कोर्ट के आदेश के बाद भी सीसीटीवी फुटेज नहीं मिला। पुलिस ने कहा ‘६ महीने से पुराना रिकॉर्ड नहीं रखते’। हाई कोर्ट ने डीजीपी को पूरे महाराष्ट्र में सीसीटीवी सिस्टम की समीक्षा का आदेश दिया।
शिकायतकर्ता को अंधेरे में रखा
हाई कोर्ट ने कहा पुलिस लोगों को पूछताछ के लिए बुलाती है, लेकिन शिकायत की कॉपी नहीं देती। यह ‘आर्टिकल २०(३) का उल्लंघन’ और ‘प्राकृतिक न्याय के खिलाफ’है।
