अरुण कुमार गुप्ता
-अश्विनी कुमार मिश्रा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश
देश की अदालतों की कार्यप्रणाली पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। अब नया विवाद पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर शुरू हो गया है। हुआ यूं कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी है। इस पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाते हुए एक ट्वीट भी कर दिया है। हालांकि, केजरीवाल ने जो सवाल उठाए हैं वह काफी हद तक वाजिब भी हैं।
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम न्यायाधीशों के प्रमोशन का निर्णय लेता है। कॉलेजियम किस आधार पर प्रमोशन करने का निर्णय लेता है यह किसी को पता नहीं है। न ही कॉलेजियम बताता भी है। आमतौर पर वरिष्ठता के आधार पर न्यायाधीशों के प्रमोशन किए जाते हैं। अश्विनी कुमार मिश्रा ३ फरवरी २०१४ को पहली बार अतिरिक्त न्यायाधीश बने थे। उनसे पहले के वरिष्ठ न्यायाधीश मनश रंजन पाठक, ए. के. जयशंकरन नाबियार, अनिल कलवण्णारा नरेंद्रन, नितिन वासुदेव सांब्रे, गिरीश शरदचंद्र कुलकर्णी न तो किसी कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाए गए हैं, न ही सुप्रीम कोर्ट के जज। उदाहरण के तौर पर न्यायाधीश मनश रंजन पाठक की नियुक्ति २२ में २०१३ को हो गई थी, लेकिन अभी तक किसी भी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाए गए हैं। इसके अलावा कई न्यायाधीश हैं जो मिश्रा जी से वरिष्ठ हैं, लेकिन इन सबको दरकिनार कर अश्विनी कुमार मिश्रा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश कर दी गई है। अब ऐसे में सवाल तो उठेगा ही कि मिश्रा जी में ऐसी क्या खास बात थी कि उनसे वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर उन्हें मुख्य न्यायधीश नियुक्त किया गया है। यह सवाल और भी गहरा जाता है, जब पता चलता है कि अश्विनी कुमार मिश्रा के भाई अजय कुमार मिश्रा २०२२ से ही उत्तर प्रदेश सरकार के एडवोकेट जनरल हैं।
सरकार के अनुरूप फैसला सुनाने का इनाम!
एक और बात जुलाई २०२२ में अश्विनी कुमार मिश्रा की बेंच के पास एक केस आया था, जिसमें किसी आदमी के खिलाफ एफआईआर की गई थी। उस आदमी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को गाली दे दी थी। वह व्यक्ति मिश्रा जी की कोर्ट में एफआईआर रद्द करवाने की अपील लेकर आया था, लेकिन मिश्रा जी की बेंच ने फैसला सुनाया कि संविधान सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बोलने का अधिकार किसी को नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश की अदालतों में पक्षपात चल रहा है। उस न्यायाधीश को प्रमोशन दिया जाएगा, जो सरकार के अनुरूप फैसला सुनाएगा।
पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए नियुक्ति!
अब सबसे बड़ी बात यह है कि कुछ महीनों बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं। पंजाब सरकार और चुनाव आयोग के बीच कोई विवाद होता है तो वह इन्हीं अश्विनी कुमार मिश्रा के पास जाएगा तो क्या इससे शक नहीं होता है कि जिस सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब एंड हरियाणा का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया है, उसके हेड खुद भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत हैं। हाल ही में इंग्लैंड के कार्यक्रम में सूर्यकांत का विरोध हुआ था। क्योंकि उन्होंने भारत के युवकों को कॉकरोच बोल दिया था।
अदालतों के खिलाफ लोगों में कुछ तो रोष जरूर है!
अभी देश की सबसे बड़ी लॉ यूनिवर्सिटी में से एक नालसर यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने का विरोध हो रहा है। कुछ तो रोष होगा इस देश की अदालतों के खिलाफ लोगों में। कॉलेजियम अपने फैसले कैसे लेता है, इसकी पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी। १९२४ में लॉर्ड हैवर्ट ने एक सिद्धांत दिया था कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। फिलहाल, हिंदुस्थान में तो ऐसा कुछ भी होते हुए नहीं दिख रहा है।
