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आजकल गांव में…

आजकल गांव में।
प्यार कहां आता है।।
भीतर बड़ा शोर है।
बाहर सन्नाटा है।।
चेहरे को देखो तो।
सबको लगा घाटा है।।
भाई ने भाई को।
कैसा जड़ा चांटा है।।
मौसम तो चुपके से।
आता है जाता है।।
सबकी दोहाई है।
सबका विधाता है।।
सांय सांय चलता है।
दर्द सहलाता है।।
कोई दर्द रोता है।
कोई दर्द गाता है।।
घर घर में देखो तो।
बिखरा हुआ नाता है।।
इधर उधर देखो तो।
स्वारथ सताता है।।
लुटा पिटा आदमी।
रोता पछताता है।।
अपने ही त्याग का।
किस्सा सुनाता है।।
नील गाय से अपनी ।
खेती बचाता है।।
हंसने के नाम पर।
चुप्पी लगाता है।।
दांव पेंच खेलता है।
योजना बनाता है।।
इसी तीन पांच में।
दिन निकल जाता है।।
रात के अंधेरे में।
गोता लगाता है।।
हरदम विचारों का।
घोड़ा दौड़ाता है।।
मानसिक अशांति में
बड़ा सुख पाता है।।
जीवन की लीला को।
माथे पहुंचाता है।।
सारा प्रपंच वह।
यहीं छोड़ जाता है।।
-अन्वेषी

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