-मैकाले की शिक्षा व्यवस्था छोड़ स्वामी करपात्री के शिक्षण चिंतन पर लौटने की आवश्यकता
उमेश गुप्ता / वाराणसी
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के 119 वें प्राकट्योत्सव के अवसर पर दुर्गाकुण्ड स्थित श्रीधर्मसंघ शिक्षा मण्डल के प्रांगण में चल रहे करपात्र प्राकट्योत्सव के छठें दिन रविवार को समग्र शिक्षा एवं धर्म सम्राट की दृष्टि विषय पर अखिल भारतीय शास्त्र संगोष्ठी सह कुलपति सम्मेलन आयोजित हुआ। धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज के पावन सानिध्य में प्रारंभ हुए सम्मेलन में डेढ़ दर्जन कुलपतियों समेत देशभर के शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान परम्परा पर दो सत्रों में विमर्श किया। विद्वानों ने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में स्वामी करपात्री जी महाराज के शिक्षण चिन्तन को छोड़ लार्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार करना एक दुःखद पहलू रहा, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत के उसी गौरवशाली शिक्षण परम्परा को वापस से लौटाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय शास्त्र में संवाद की भूमिका रही है ना कि प्रतिद्वन्दिता का भाव रहा है। वर्तमान में जिस व्यवस्था ने हमारे विद्यार्थियों को एक दायरे में बांधा है उसके लिए विद्यार्थी दोषी नहीं बल्कि हमारे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा से जुड़े व्यक्ति हैं। हमारें यहां तो यह परम्परा रही है कि अगर ज्ञान शत्रु से भी मिले तो उसे शिरोधार्य करना चाहिए, जिसका प्रमाण प्रभु श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को मृत्यु शैय्या पर पड़े रावण से ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजना था। उन्होंने कहा कि स्वामी करपात्री जी महाराज का मत था कि विज्ञान और तकनीक समाज के लिए होनी चाहिए ना कि समाज को विज्ञान और तकनीक के अनुरूप होना चाहिए।
विशिष्ट व्याख्यान देते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने कहा कि ज्ञानार्जन से अधिक ज्ञान का संरक्षण उससे अधिक जरुरी है उसका संरक्षण की आवश्यकता है। क्योंकि हमारे ज्ञान का सिर्फ एक केंद्र नालंदा रहा जिसे नष्ट कर दिया गया ताकि हमारा ज्ञान भी नष्ट हो जाये। इसलिए ज्ञान को स्वामी जी के मतानुसार विस्तृत रूप से प्रसारण करने की आवश्यकता है
वरिष्ठ शिक्षाविद एवं पूर्व कुलपति प्रो. एडीएन बाजपेयी ने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से काफी भिन्न है, वहां ज्ञान का सृजन किया जाता है जबकि हमारी परंपरा में ज्ञान एक प्रवाहमान परम्परा है, इसमें जब भी संशोधन की आवश्यकता पड़ी हमारे विद्ववानों ने हमेशा शास्त्रार्थ का मार्ग चुना।
लाल बहादुर शास्त्री केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि स्वामी जी ने शिक्षा का अर्थ दो शब्दों से समझाया है ज्ञान और विज्ञान और इसका आधार सत्य समागम, सत्य शिक्षा है जिससे सद्बुद्धि और सद् व्यक्ति का निर्माण हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि गुरु सिर्फ पुस्तक नहीं पढ़ता बल्कि समग्र जीवन शिक्षा प्रदान करता है।
इससे पूर्व सम्मेलन का शुभारंभ धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। कार्यक्रम का संयोजन धर्मसंघ महामंत्री पं. जगजीतन पाण्डेय ने किया। स्वागत प्रो.रामनारायन द्विवेदी, राजमंगल पाण्डेय एवं संचालन प्रो.विनय पाण्डेय ने किया।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रो. रमाकांत पाण्डेय, कुलपति, उत्तराखंड संस्कृत विवि, हरिद्वार, प्रो. मनोज दीक्षित, कुलपति, राम मनोहर लोहिया विवि, प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय राष्ट्रीय अध्यक्ष, संस्कृत भारती, नई दिल्ली, प्रो.दिनेश चंद्र राय, कुलपति, बीआर अम्बेडकर विवि, मुजफ्फरपुर, बिहार, प्रो. शिवशंकर मिश्र, कुलगुरु महर्षि पाणिनि संस्कृत विवि, उज्जैन, प्रो.बृजेश पाण्डेय, रेक्टर, जेएनयू, नई दिल्ली, प्रो. साहित्य कुमार नाहर, पूर्व कुलपति, प्रो. अरविंद कुमार दीक्षित, कुलपति आगरा विवि, जीसीआर जायसवाल, पूर्व कुलपति, प्रो.राकेश उपाध्याय, निदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली समेत दो दर्जन शिक्षाविदों ने भी विचार रखें।
