उमेश गुप्ता / वाराणसी
काशी में आस्था, परंपरा और सूर्योपासना का प्रमुख पर्व लोलार्क छठ इस बार विशेष संयोग लेकर आ रहा है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर 17 सितंबर को भदैनी स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड में लोलार्क छठ का प्रसिद्ध मेला लगेगा। इस बार करीब सात साल बाद लोलार्क षष्ठी पर सात महायोग बनने का संयोग बताया जा रहा है। इनमें सिद्धि योग, राजयोग और पांच महापुरुष योग शामिल हैं। इस विशेष संयोग के कारण पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।
लोलार्क छठ पर पूर्वांचल के अलावा दिल्ली, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं के काशी पहुंचने की संभावना है। संतान प्राप्ति की कामना से बड़ी संख्या में दंपती लोलार्क कुंड में स्नान कर लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन-पूजन करेंगे। मान्यता है कि कुंड में श्रद्धापूर्वक स्नान करने से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
उदया तिथि के चलते 17 सितंबर को पर्व
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रख्यात ज्योतिषविद प्रो. नागेंद्र पांडेय के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 16 सितंबर की सुबह 8:55 बजे शुरू होकर 17 सितंबर की सुबह 10:26 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के कारण लोलार्क छठ का पर्व 17 सितंबर को मनाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि ‘लोल’ का अर्थ चंचल और ‘अर्क’ का अर्थ सूर्य होता है। भादो मास में आसमान में बादलों के कारण सूर्य की स्थिति चंचल दिखाई देती है, इसी कारण इस तिथि को लोलार्क कहा गया है। पुराणों में भी लोलार्क षष्ठी की विशेष प्रतिष्ठा बताई गई है।
सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक सर्वोत्तम मुहूर्त
आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार लोलार्क षष्ठी पर इस बार कुल सात योग बन रहे हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 3:55 से 5:40 बजे तक रहेगा। इसके बाद सुबह 5:41 से 6:30 बजे तक विजय मुहूर्त रहेगा। मान्यता है कि इस दौरान किए गए धार्मिक अनुष्ठान शारीरिक बाधाओं को दूर करने और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सहायक होते हैं।
सुबह 6:31 से 10:26 बजे तक स्नान, दान और पूजा का सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा। इसके बाद उदयकालीन तिथि होने के कारण सूर्यास्त तक श्रद्धालु कुंड में स्नान, दान-पुण्य और लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन-पूजन कर सकेंगे। सर्वार्थ सिद्धि योग के बनने से भी पर्व के फल में वृद्धि होने की मान्यता है।
संतान की कामना से दंपती करते हैं स्नान
लोलार्क छठ का सबसे प्रमुख विधान संतान प्राप्ति की कामना से लोलार्क कुंड में स्नान करना है। मान्यता के अनुसार दंपती कुंड में स्नान करने के बाद एक फल चढ़ाकर वहीं छोड़ देते हैं। संतान प्राप्ति होने तक उस फल को ग्रहण नहीं किया जाता। इसके साथ ही स्नान के दौरान पहने गए वस्त्रों को भी कुंड पर छोड़ने की परंपरा है।
लोलार्केश्वर महादेव मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने बताया कि लोलार्क कुंड को सूर्य कुंड माना जाता है। मान्यता है कि सूर्यदेव के रथ का पहिया यहां धंस गया था, जिससे कुंड का निर्माण हुआ और यहां जल का स्रोत बना।
राजा की मनोकामना पूरी होने की मान्यता
महंत के अनुसार मान्यता है कि पश्चिम बंगाल के कूचबिहार राज्य के राजा चर्मरोग से पीड़ित थे और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। काशी यात्रा के दौरान उन्होंने लोलार्क कुंड में स्नान किया। इसके बाद उनका रोग दूर हो गया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। मनोकामना पूरी होने के बाद उन्होंने कुंड के भीतर सोने की सीढ़ियां बनवाईं तथा सात मन तांबे से सात जालियां बनवाईं। इन जालियों से जल छनकर निकलने की मान्यता है।
लोलार्क कुंड का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। बाद में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कुंड के चारों ओर कीमती पत्थरों से सजावट करवाई थी। धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोलार्क कुंड काशी के प्रमुख आस्था स्थलों में गिना जाता है।
सूर्य की किरणों और कुंड के जल से जुड़ी मान्यता
महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय के अनुसार लोलार्क कुंड की बनावट भी विशेष मानी जाती है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की किरणें कुंड के जल पर विशेष रूप से पड़ती हैं। श्रद्धालु इसे संतान प्राप्ति से जोड़कर देखते हैं। साधु-संतों के लिए भी इस स्नान का विशेष महत्व बताया गया है और मान्यता है कि लोलार्क कुंड में स्नान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
लोलार्क छठ को लेकर काशी में अभी से तैयारियां शुरू हो गई हैं। पर्व के दिन भदैनी क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। संतान प्राप्ति की कामना से आने वाले दंपतियों के साथ बड़ी संख्या में साधु-संत और अन्य श्रद्धालु भी कुंड में स्नान कर लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन करेंगे। सात महायोग के संयोग के कारण इस वर्ष लोलार्क छठ को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
