-इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार
-उमन गुप्ता
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के नाम पर ‘गुंडा एक्ट’ के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडा एक्ट, १९७० का इस्तेमाल लगातार उत्पीड़न के हथियार के तौर पर किए जाने के मामले अदालत के सामने आ रहे हैं। कोर्ट ने गोंडा निवासी जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और छह महीने के लिए जिला बदर करने के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को ठोस अपराध में दोषी ठहराए बिना केवल पुराने मामलों के आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने जाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने गोंडा के जिलाधिकारी द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करते हुए जिले से बाहर रहने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही देवीपाटन मंडल के आयुक्त द्वारा जिलाधिकारी के आदेश की पुष्टि करने संबंधी आदेश को भी रद्द कर दिया गया।
‘दमन का हथियार’ न बनाएं कानून
हाई कोर्ट ने कहा कि अदालतें पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि गुंडा एक्ट एक शक्तिशाली कानून है और इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी तथा संयम के साथ किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से सार्वजनिक अव्यवस्था या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाले मामलों से निपटना है। अदालत ने राज्य सरकार को आगाह किया कि इस कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को परेशान करने या उन्हें प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि अदालत के सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि राज्य गुंडा एक्ट का इस्तेमाल उत्पीड़न के हथियार के रूप में कर रहा है। अदालत ने मौजूदा मामले को भी कानून के कथित दुरुपयोग का ‘ज्वलंत उदाहरण’ बताया।
जिस मामले में बरी, उसी को बनाया आधार
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने के लिए पुलिस ने जिन दो आपराधिक मामलों का उल्लेख किया था, उनमें से एक मामले में उसे पहले ही बरी किया जा चुका था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे में उसकी संलिप्तता को उस मामले में बरी होने के बाद उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि जाहिद अली को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा होने का कोई ठोस आरोप सामने नहीं था। हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि अली ने जिलाधिकारी के समक्ष अपनी आपत्ति में अपने बरी होने की जानकारी नहीं दी थी, इसलिए केवल इस आधार पर जिलाधिकारी को गलती का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस को अली के बरी होने की जानकारी होने की संभावना थी। इसके बावजूद उस पुराने मामले में उसकी संलिप्तता का उल्लेख किया गया, जिससे जिलाधिकारी के सामने उसकी गलत छवि पेश हुई।
दोनों आदेश किए रद्द
सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोंडा के जिलाधिकारी तथा देवीपाटन मंडल के आयुक्त द्वारा जाहिद अली के खिलाफ पारित दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत का यह फैसला उत्तर प्रदेश में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाए गए कठोर कानूनों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने या उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
