विमल मिश्र, मुंबई
दही हंडी संपन्न हो गई, अब गणेश चतुर्थी के साथ महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पर्व शुरु होने को है। गणेशोत्सव सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है। मुंबई के गणेशोत्सव को देश के दूसरे हिस्सों के गणेशोत्सव से अलग बनाने वाली अनेक बातें हैं। दही हंडी के साथ इसे यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में जगह मिलनी ही चाहिए, जिसका महाराष्ट्र सरकार ने इस विश्व संस्था से अनुरोध किया है।
-देश का यह पहला सार्वजनिक गणेशोत्सव है, जिसकी नींव लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने १८९३ में मुंबई की केशवजी नाईक चॉल में रखी थी। लक्ष्य था ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों को एकजुट और संगठित करके देश की स्वतंत्रता की राह पर तेजी से अग्रसर करना। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के उस कानून की काट के रूप में गणेशोत्सव को सार्वजनिक मंच बनाया, जिसके तहत भारतीयों के एक जगह इकट्ठा होने पर पाबंदी थी। ब्रिटिश सरकार इससे इस कदर घबरा गई थी कि अंग्रेजों की रॉलेट कमेटी रपट में बाकायदा इस बात पर चिंता जताई गई थी कि ‘गणेशोत्सव के दौरान युवकों और बच्चों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूमकर अंग्रेजी शासन विरोधी गीत गाया करती हैं।’ धीरे-धीरे पड़ोस की शांताराम जगन्नाथ और गोरेगांवकर चॉलों की तरह केशवजी नाईक चॉल भी क्रांतिकारियों का अभयारण्य बन गई थी। लालबाग के पास ही स्थित गणेश गल्ली (मुंबईचा राजा) मंडल ने १९४५ में एक अनोखा रथ बनाया था, जिसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सारथी के रूप में दिखाया गया था।
-मुंबई का गणेश विसर्जन पूरे विश्व में विशालतम जन-सैलाबों में गिना जाता है। चॉलों और सोसायटियों में रहने वाले विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग महीनों पहले से मिलकर इसकी तैयारी किया करते हैं। सवा दो लाख से अधिक मुंबईवासी अपने घरों में भी डेढ़ दिन, पांच दिन, सात दिन या नौ दिन के ‘घरगुती गणपति’ की स्थापना करते हैं। महाराष्ट्र में २८ लाख प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इस वर्ष अकेले मुंबई में १०६०० से अधिक सार्वजनिक गणपति मंडलों के आयोजन हो रहे हैं। उनके विसर्जन समुद्र, झीलों, तालाबों और कृत्रिम जलाशयों में होते हैं। अकेले गिरगांव चौपाटी पर ७,००० से अधिक गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है।
-११ दिन का गणेशोत्सव कम से कम ३५,००० करोड़ रुपये का बिजनेस पैदा करता है। हर साल १५-२० फीसदी के हिसाब से बढ़ने वाला यह बिजनेस लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार का जरिया होने के साथ बहुतों को पार्ट टाइम बिजनेस का अवसर भी उपलब्ध कराता है।
-मुंबई देश की आर्थिक और मनोरंजन राजधानी है। देश का कोई अन्य त्योहार या उत्सव ऐसा नहीं है, जिसमें राजनेता, बॉलीवुड सितारे और उद्योगपति इतने बड़े पैमाने पर सीधी भागीदारी करते हों।
‘मन्नत का राजा’ कहलाने वाले परेल के ‘लालबागचा राजा’ से अधिक लोकप्रिय उत्सव शायद ही भारत भर में दूसरा कोई है। इस गणेशोत्सव मंडल को कीर्तिमानों के अक्स में देखना हमारी आदत बन गई है। इसे देखने देश-विदेश से आम व वीआईपी-वीवीआईपीज तथा लाखों भक्त आते हैं। १० दिन तक रोज, प्यारे बाप्पा की एक झलक के लिए ‘नवसाची’ व ‘मुख दर्शनाची’ आठ से १० लाख भक्तों की बगैर खाए-पिए २०-२४ घंटे तक तंग गलियों और पुलों तक पर लगने वाली पांच-छह किलोमीटर लंबी कतारें। ३५-३५ घंटे तक चलने वाला विसर्जन जुलूस और उसके लिए समुद्र तट पर विद्युतचालित विशेष राफ्ट। सुरक्षा और भक्तों की देखभाल व सुविधाओं के इंतजाम के लिए मुंबई पुलिस, सेना और ३५ सरकारी मंडलों के साथ खुद लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल के अपने ४,००० महिला-पुरुष कार्यकर्ताओं के बंदोबस्त किए जाते हैं। हर वर्ष अलग थीम पर बनने वाले लंबे -चौड़े बेशकीमती व भव्य पंडाल व मंच होते हैं। पूरे इलाके को मेले जैसा लुक दिया जाता है। विश्वभर के भक्तों द्वारा सोने-चांदी-हीरे के आभूषणों सहित करोड़ों रुपये का चढ़ावा, मुंह-मांगे दामों पर प्रसाद’ की खुली नीलामी और गणेशोत्सव का ५० करोड़ रुपये से ज्यादा का बीमा होता है। विशेष पूजन विधियां और मशहूर कलाकारों द्वारा बनने वाले मुंबई के १४ फुट ऊंचे, सबसे सुंदर, सबसे अलंकृत और सबसे महंगे गणपति। गणपति मंडप से लगी तीखी मिर्ची गली व स्वादिष्ट चिवड़ा गली और हां, भयानक भीड़ भरी लंबी लाइन में लगे धक्का खाते भक्तों के बटुओं, आभूषणों और मोबाइल फोन की उचक्कागीरी भी होती है। १० दिनों में लगभग एक करोड़ भक्त बप्पा का दर्शन करते हैं।
-माटुंगा का जीएसबी सेवा मंडल मुंबई ही नहीं, देश का सबसे अमीर या समृद्ध गणेश मंडल है। यहां बाप्पा की मूर्ति को ६० किलोग्राम से अधिक शुद्ध सोने और हीरों के आभूषणों से सजाया जाता है। पूरे उत्सव का ४०० से ५०० करोड़ रुपये का बीमा कराया जाता है।
-वीरा देसाई रोड, अंधेरी का अंधेरीचा राजा ‘उपनगरों का लालबागचा राजा’ भी कहा जाता है। यहां बाप्पा का विसर्जन अनंत चतुर्दशी (१०वें दिन) को न होकर संक्रांति के दिन (२१वें दिन) होता है।
-मुंबई के कुछ मूल निवासी समुदायों, जैसे पाठारे प्रभु समुदाय में बाप्पा की माता गौरी के साथ उनकी एक सहेली की मूर्ति भी रखी जाती है, जिसे परिवार के मिलन का प्रतीक माना जाता है। बच्चों को परंपरा से जोड़ने के लिए घर में एक छोटा गणपति पंडाल बच्चों के खेलने के लिए अलग से बनाया जाता है, जहां वे चांदी के छोटे बर्तनों से बाप्पा को भोग लगाते हैं।
-लोकल ट्रेनों ही नहीं, पुणे, नासिक, मनमाड, वापी, बलसाड, सूरत, रोहा, पेण और आप्टा तक आने-जाने वाले हजारों की संख्या में रेलवे के ऐसे नियमित दैनिक यात्री हैं, जो खुद को मुंबई का यात्री ही समझते हैं और रोजाना की यात्रा में गणेशोत्सव मनाते हैं।
-मंडपों में दर्शन करने वाले भक्त हजारों की तादाद में अपने जूते-चप्पल भी खो जाते हैं। विसर्जन के बाद मुंबई के समुद्र तटों से एकत्र कचरे का परिमाण ३०५९ मीट्रिक टन से अधिक होता है। इसमें निर्माल्य सामग्री का हिस्सा ५५० मीट्रिक टन होता है। इसीलिए अब शाडू मिट्टी से पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाएं बनाकर विसर्जित करने का चलन चल पड़ा है। पिछले ही दिनों नवी मुंबई के वाशी सिडको एक्जिबिशन सेंटर में १० हजार से अधिक विद्यार्थियों ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है।
-मुंबई के सार्वजनिक मंडलों में पहले गणेश प्रतिमाएं साधारण मानव आकार से कुछ ही बड़ी, ज्यादा से ज्यादा छह-सात फुट की दुबली काया की होती थीं। १९७७ में गणेश गली में पहली बार २२ फुट की प्रतिमा स्थापित हुई। तब से ही बड़े मंडलों में विराट आकार की प्रतिमाओं का चलन चल पड़ा। लालबाग सिर्फ अपने गणपति के लिए प्रसिद्ध नहीं है, यहां वर्ष भर गणेश व अन्य देवी-देवताओं के साथ दूसरी प्रतिमाओं का भी निर्माण होता रहता है, जहां काम करने हर वर्ष २०,००० से अधिक मूर्तिकार उत्तर प्रदेश व बंगाल, आदि प्रदेशों से आया करते हैं। प्रभादेवी और कुर्ला जैसी जगहों पर भी कई गणेश वर्कशॉप्स हैं। फिलहाल, महानगर में जितनी गणेश मूर्तियों की जरूरत है उसका दो-तिहाई बाहर पेण, पुणे, रत्नागिरी, कल्याण, पनवेल, अलीबाग, टिटवाला, आदि जगहों से आ रहा है।
-मुंबई के गणेशोत्सव में बीते सालों में बहुत कुछ बदल गया है। पंडालों में मूर्तियों के साथ अब झांकियां भी मुख्य आकर्षण हैं। १९५० और १९६० के दशक में फिल्मी संस्कृति से प्रेरित हो कर बड़े स्तर पर झांकियों की शुरुआत हुई। १९८० में जब स्पांसरों के बैनर लगने शुरू हुए थे, इस त्योहार के व्यवसायीकरण की शुरुआत हुई थी। १९९० के दशक में उदारीकरण के बाद धन का प्रभुत्व और तकनीक का दखल बढ़ने लगा। लिहाजा अधिक भव्य सेट, बेहतर साउंड तथा तामझाम तो हुआ ही, पंडालों के बीच प्रतिद्वंद्विता और उससे जुड़ी हिंसा भी बढ़ गई। अब तो वह वक्त है जब ‘ध्वनि प्रदूषण’ जैसे कानूनों को हस्तक्षेप करने की जरूरत आ पड़ी है। इसकी मिसाल है डीजे को लेकर मौजूदा विवाद।
