मुख्यपृष्ठनए समाचारप्रसिद्ध कवि विनोद दास का मुंबई में काव्य-पाठ

प्रसिद्ध कवि विनोद दास का मुंबई में काव्य-पाठ

 सामना संवाददाता / मुंबई

जनवादी लेखक संघ, मुंबई और स्वर संगम फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को मीरा रोड में प्रतिष्ठित कवि विनोद दास के काव्य-पाठ एवं उनकी कविताओं पर परिचर्चा का सफल आयोजन किया गया। लगभग तीन घंटे तक चले इस साहित्यिक समारोह में कविता-पाठ के साथ विनोद दास की रचनाओं के सामाजिक सरोकारों, वैचारिक पक्ष और कलात्मक विशेषताओं पर गंभीर एवं आत्मीय संवाद हुआ।
विनोद दास हिंदी के प्रतिष्ठित कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक और संपादक हैं। उनके प्रमुख कविता-संग्रहों में ख़िलाफ़ हवा में गुज़रते हुए, वर्णमाला से बाहर, कुजात और पतझड़ में प्रेम शामिल हैं। भारतीय ज्ञानपीठ युवा पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, केदारनाथ अग्रवाल सम्मान और शमशेर सम्मान से सम्मानित विनोद दास ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
विनोद दास की कविताओं के केंद्र में श्रमशील, संघर्षरत और हाशिये पर खड़ा साधारण मनुष्य है। उनकी कविताएँ भूख, श्रम, स्त्री-अस्मिता, प्रेम, विस्थापन और सामाजिक अन्याय जैसे विषयों को व्यापक मानवीय संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती हैं। सहज और आत्मीय भाषा में रची गई उनकी कविताएँ सामान्य जीवन के अनुभवों को हमारे समय के बड़े सामाजिक प्रश्नों से जोड़ती हैं।
संयोग से 19 सितंबर वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण की जन्मतिथि और प्रखर कवि-आलोचक विष्णु खरे की पुण्यतिथि भी है। इसलिए कार्यक्रम का आरंभ इन दोनों महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों की स्मृति को नमन करते हुए किया गया।
कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. मुख़्तार खान ने जनवादी लेखक संघ की साहित्यिक पृष्ठभूमि, उसकी वैचारिक परंपरा और हिंदी साहित्य में उसके योगदान पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात डॉ. रीता दास राम ने कवि विनोद दास के साहित्यिक व्यक्तित्व और रचनात्मक अवदान से श्रोताओं का परिचय कराया।
इस अवसर पर जनवादी लेखक संघ, मुंबई के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवि हृदयेश मयंक को उनके 75वें जन्मदिवस पर सम्मानित किया गया। साहित्यप्रेमी एवं समाजसेवी सभाजीत यादव ने भी कवि विनोद दास और हृदयेश मयंक को शाल ओढ़ाकर तथा पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि हृदयेश मयंक ने कहा कि विनोद दास की कविता वर्ग-संघर्ष की कविता है और उसमें विभिन्न वर्गों के बीच का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि विनोद दास ने अपनी कविताओं में शहरी जीवन के संघर्षों, विडंबनाओं और यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में विनोद दास ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। उनके काव्य-पाठ के माध्यम से श्रोताओं को उनकी रचनात्मकता के विविध रंगों—प्रेम, करुणा, प्रतिरोध, सामाजिक विषमता और मानवीय संघर्ष—से साक्षात्कार हुआ।
दूसरे सत्र में आमंत्रित वक्ताओं और विद्वानों ने विनोद दास की कविताओं के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार रखे। कवि जुल्मीरामसिंह यादव ने विनोद दास की रचनाओं पर केंद्रित अपना आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विनोद दास की जनप्रतिबद्धता और लेखकीय ईमानदारी उनकी कविताओं में फूलों की गंध की तरह व्याप्त है तथा उनके शब्दों को नया अर्थ और नई आभा प्रदान करती है। मार्क्सवादी दृष्टि से उनकी कविता मनुष्य की पीड़ा को व्यक्तिगत नियति नहीं मानती, बल्कि उसके पीछे सक्रिय शोषण और असमान सामाजिक संरचना को उजागर करती है। वह परिचित जीवन-दृश्यों के भीतर छिपे सत्ता-संबंधों, विषमता और प्रतिरोध की संभावनाओं को पहचानने की दृष्टि देती है। इस प्रकार उनकी कविता पाठक को केवल संवेदित नहीं करती, बल्कि अपने समय, समाज और मानवीय दायित्वों के प्रति सजग भी बनाती है।
कवि शैलेश सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि विनोद दास केवल हिंदी भाषा के कवि नहीं, बल्कि व्यापक हिंदी समाज के कवि हैं। पतझड़ में प्रेम कविता-संग्रह की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी कविताओं में देह से परे सहचर्य से उपजे प्रेम, स्त्री-समानता और गृहस्थ जीवन के संघर्षों का संवेदनशील आख्यान उपस्थित है।
प्रोफेसर हूबनाथ पांडे ने कहा कि विनोद दास की कविताएँ अपने भीतर अत्यंत गहरे और बहुस्तरीय अर्थ समेटे हुए हैं। पाठक इन कविताओं में जितनी गहराई से प्रवेश करता है, उसे उतनी ही नई दृष्टि और अर्थ की नई परतें प्राप्त होती हैं। उन्होंने कहा कि ये कविताएँ केवल सुनने की अपेक्षा बार-बार और गंभीरता से पढ़े जाने की माँग करती हैं।
प्रसिद्ध अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने विनोद दास की कविताओं की प्रशंसा करते हुए उनकी एक लंबी कविता का अपनी दमदार आवाज़ में सशक्त पाठ किया। उनकी प्रभावपूर्ण प्रस्तुति ने कविता के भाव और अर्थ को श्रोताओं के सामने अत्यंत जीवंत ढंग से उपस्थित कर दिया।
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक अविनाश दास ने एक विदेशी फिल्मकार के कथन का हवाला देते हुए कहा कि विनोद दास की कविता नदी के प्रवाह की तरह निरंतर आगे बढ़ती है। उनकी कविता की एक विशिष्टता यह है कि पढ़ते हुए कई बार लगता है कि कविता यहाँ समाप्त हो गई, लेकिन उसकी अर्थ-यात्रा उसके बाद भी पाठक के भीतर जारी रहती है। वह पाठक के अनुभव और संवेदना से इस तरह जुड़ती है कि अंततः उसे अपनी ही कविता प्रतीत होने लगती है।
वरिष्ठ कवि अनूप सेठी ने पतझड़ में प्रेम के संदर्भ में पति-पत्नी के रिश्ते की जटिलताओं, उसकी आत्मीयता और सहचर्य के विविध आयामों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने संग्रह की अनेक कविताओं को उद्धृत करते हुए विनोद दास की अन्य कृतियों के रचनात्मक और वैचारिक पक्षों पर भी प्रकाश डाला।
सुप्रसिद्ध कवि बुद्धि लाल पाल ने विनोद दास की कविताओं से मिलने वाली आश्वस्ति पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इन कविताओं के वैचारिक पक्ष से अपनी सहमति जताते हुए कहा कि सामाजिक यथार्थ से संवाद करने और मनुष्य के पक्ष में विवेकपूर्ण चेतना जगाने वाली ऐसी कविताएँ आज के समय की आवश्यकता हैं।
इस अवसर पर कवि फरीद खान, अजय रोहिल्ला और संजय भिसे ने विनोद दास की एक-एक कविता का प्रभावशाली पाठ किया। आसिफ़ा क़ायनात ने विनोद दास की पुरानी कविता ‘दिल्ली’ की संगीतमय प्रस्तुति दी, जिसे श्रोताओं ने विशेष रूप से सराहा।
इस अवसर पर खचाखच भरे सभागार में कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और साहित्यप्रेमी श्रोताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। उपस्थित प्रमुख लोगों में प्रो. सुमनिका सेठी, विनीता तिवारी, डॉ. हुस्ना तबस्सुम निहा, आर. एस. विकल, राकेश शर्मा, डॉ. गुलाबचंद यादव, प्रो. शोभनाथ गुप्त, मुस्तहसन अज्म, प्रशांत जैन, प्रो. उत्तम भगत, रवि शेखर, फ़िरोज़ खान, राजेश विक्रांत, सलमा सय्यद, पुलक चक्रवर्ती, दिनेश गुप्त, शफ़ीक़ खान, मुशर्रफ़ शम्सी, पुरुषोत्तम वानखेड़े, प्रभात प्रभाकर, भूपेंद्र मिश्रा, जेनी मयूर, अनिल गौड़, अधिवक्ता संजय पांडे, राम आधार सिंह, राजीव रोहित, कृष्णा गौतम, ज़ाकिर सरदार, डॉ. जितेंद्र पांडे, आशीष राऊत, मोइन अंसार और भगवान कौशिक सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी शामिल थे। सभागार की उत्साहपूर्ण उपस्थिति और श्रोताओं की सक्रिय सहभागिता ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रोता मंत्रमुग्ध होकर कविताओं और वक्ताओं के विचार सुनते रहे। कविताओं की संवेदनात्मक गहराई तथा उन पर केंद्रित विचारोत्तेजक वक्तव्यों ने आयोजन को एक सार्थक साहित्यिक संवाद में बदल दिया।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. रीता दास राम और डॉ. मुख़्तार खान ने संयुक्त रूप से किया। अंत में संजय भिसे ने जनवादी लेखक संघ, मुंबई की ओर से कवि विनोद दास, सभी अतिथियों, वक्ताओं, रचनाकारों और उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
यह आयोजन केवल एक काव्य-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समकालीन कविता, समाज और साधारण मनुष्य के संघर्षों पर केंद्रित एक गंभीर, आत्मीय और स्मरणीय साहित्यिक विमर्श के रूप में संपन्न हुआ।

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