-तौसीफ कुरैशी
भारतीय सियासत में इन दिनों सेतु बनाने से ज्यादा सेतु तोड़ने की सियासत हो रही है। सड़क पर पुल बन जाए तो उद्घाटन की पट्टिका पर नाम को लेकर सियासत शुरू हो जाती है और विधानसभा में पुल बनाने का श्रेय लेने के लिए बयानबाजी। नफरत के इस दौर में ऐसे किरदार देखने को मिले, जिसमें मोहब्बत हो, आपसी समन्वय हो। केरल के कोट्टायम जिले के पूंजार से आई एक खबर सिर्फ खबर नहीं, बल्कि राजनीति के गिरते हुए शिष्टाचार के बीच एक जरूरी सबक है। पूंजार विधानसभा सीट से कांग्रेस के मौजूदा विधायक सेबेस्टियन एमजे ने अपने पूर्ववर्ती और एलडीएफ नेता सेबेस्टियन कुनाथुकाल लाथुंकल से उस पुल का उद्घाटन कराया, जिसकी नींव उनके ही कार्यकाल में पड़ी थी। दोनों चुनाव में आमने-सामने थे। हालिया विधानसभा चुनाव में सेबेस्टियन एमजे ने कुलाथुंकल को हराकर विधायक का चुनाव जीता। लेकिन चुनाव खत्म होते ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को विकास के काम के बीच दीवार नहीं बनने दिया गया। एरुमेली-अमाकुन्नु पुल के लिए कुलाथुंकल के कार्यकाल में विधायक निधि से ८० लाख रुपए मंजूर किए गए थे। वर्ष २०१८ की बाढ़ में पुराने पुल को नुकसान पहुंचा था, जिसके बाद नए पुल की जरूरत महसूस हुई। करीब १५.५ मीटर लंबे इस नए पुल के निर्माण से क्षेत्र के ३०० से अधिक परिवारों को आवागमन की सुविधा मिली। अब जरा उद्घाटन की तस्वीर देखिए। जिस नेता को हराकर मौजूदा विधायक विधानसभा पहुंचे, उसी पूर्व विधायक को उन्होंने पुल के उद्घाटन के लिए बुलाया। उससे भी बड़ी बात यह कि उद्घाटन की पट्टिका पर मौजूदा विधायक का नाम तक नहीं लिखवाया गया। वहां सिर्फ ‘पूंजार विधायक’ लिखा गया। यह छोटी बात नहीं है, क्योंकि हमारे यहां तो कई बार विकास की सड़क शुरू होने से पहले ही श्रेय की सियासत शुरू हो जाती है। योजना पिछली सरकार ने बनाई तो नई सरकार उसे अपनी बताती है, जैसा हो रहा है नफरत के इस दौर में योजनाएं कांग्रेस सरकार की थीं बताई अपनी जा रही हैं। पैसा किसी और ने मंजूर किया तो उद्घाटन कोई और करता है और पत्थर पर अपना नाम सबसे ऊपर चाहता है नाम का भूखा महामानव। जैसे जनता पुल पर चलती नहीं, नेताओं के नाम पढ़ने के लिए आती है। लेकिन सेबेस्टियन एमजे ने साफ कहा कि अगर पूर्व विधायक ने फंड आवंटित नहीं किया होता तो परियोजना आगे नहीं बढ़ती। इसलिए इसका श्रेय पूर्व विधायक को जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कुलाथुंकल ने अपने कार्यकाल में जो जिम्मेदारी निभाई, अब उनका काम उस विकास कार्य को आगे बढ़ाना है। यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती होनी चाहिए।
चुनाव में कोई जीतेगा, कोई हारेगा। विधानसभा में दोनों अलग-अलग खेमों में बैठेंगे। एक सत्ता पक्ष में होगा, दूसरा विपक्ष में। दोनों की विचारधारा अलग होगी, राजनीतिक रणनीति अलग होगी और अगले चुनाव में फिर मुकाबला भी होगा। लेकिन क्या जनता के काम को भी उसी राजनीतिक लड़ाई में घसीट देना जरूरी है? पुल जनता के पैसे से बना है, जनता के लिए बना है। जिसने उसके लिए धन मंजूर किया, उसका योगदान स्वीकार करना और जिसने उसे पूरा कराया, उसका योगदान मानना दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं। सियासत में श्रेय बांटने से किसी नेता का कद छोटा नहीं होता, लेकिन नफरतियों के इस दौर में हो जाता है। बल्कि कई बार यहीं से राजनीतिक कद बड़ा होता है। हमारे लोकतंत्र में शायद इस बात को फिर से याद करने की जरूरत है कि सरकारें बदलती हैं, विधायक बदलते हैं, पार्टियां बदलती हैं, मगर जनता वहीं रहती है। उसके स्कूल, सड़क, अस्पताल, पुल और पानी की जरूरतें किसी पार्टी के घोषणापत्र के साथ खत्म नहीं होतीं। पूंजार का यह पुल इसलिए सिर्फ एरुमेली और अमाकुन्नु को नहीं जोड़ता। उसने दो राजनीतिक खेमों के बीच भी एक रास्ता बनाया है। यह उम्मीद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विचारधारा के मानने वालों से ही की जा सकती है नफरती आतंकी नाथूराम गोडसे की विचारधारा के मानने वालों से नही। एक ऐसा रास्ता, जिस पर चलकर सियासत शायद फिर से यह सीख सकती है कि प्रतिद्वंद्वी को हराना लोकतंत्र है, लेकिन उसके अच्छे काम को नकारना लोकतंत्र नहीं। काश, देश की राजनीति में विकास की हर पट्टिका पर नेताओं के नाम से ज्यादा जनता का नाम लिखा जाए। क्योंकि आखिरकार पुल नेता के नाम से नहीं, जनता के पैसों से बनते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद जनता को पुल चाहिए, पिछली सरकार की उपलब्धि को मिटाने वाला नया पत्थर नहीं। सत्यमेव जयते
