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‘सिर्फ मोहरा बदले, खेल वही’…पीएम के हस्तक्षेप के बाद भी ‘दोस्त’ आज तक न्याय के इंतजार में?

सुरेश गोलानी / मुंबई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के मित्र असगर अली वोरा के मालिकाना हक वाली मीरा रोड स्थित जमीन को लेकर चल रहा विवाद एक नए और बेहद पेचीदा मोड़ पर आ खड़ा हुआ है।
पीएम के हस्तक्षेप के बाद मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के ठीक पहले विधायक भाजपा नरेंद्र मेहता से जुड़ी सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन कंपनी के संचालक ने पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर कहा है कि दोनों पक्षों के बीच ‘सौहार्दपूर्ण समझौता’ हो गया है और वे असगर अली वोरा के खिलाफ अपनी पुरानी शिकायतें वापस ले रहे हैं। इसके अलावा कंपनी ने मनपा के नगररचना विभाग को पत्र लिखकर जमीन पर अपनी निर्माणकार्य अनुमति आधिकारिक रूप से सरेंडर कर ऐसा जता दिया कि असगर वोरा को इंसाफ मिल गया है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सच तो यह है कि आज भी असगर वोरा के पास न तो जमीन के एक इंच हिस्से का कब्जा है और न ही सरकारी राजस्व दस्तावेजों में उनका नाम दर्ज हो पाया है। इसके विपरीत जमीन पर लगा विधायक की कंपनी का बोर्ड हटा दिया गया, लेकिन उसकी जगह अब मेरवीन जोसेफ फर्नांडिस और मुकेश सी. पारेख को इस जमीन (गांव- नवघर, पुराना सर्वे नंबर- २४० नया-१८५ हिस्सा नंबर- ६ बी, प्लॉट एरिया- १४०५ वर्ग मीटर) का ५० प्रतिशत मालिक घोषित करते हुए नया बोर्ड लगा दिया गया है। हालांकि, बोर्ड बदलने के बावजूद वोरा को अभी तक जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिला है। वोरा के अनुसार, उन्होंने १९८९ में भायंदर (पूर्व) के नवघर इलाके में लगभग २,८१० वर्ग मीटर जमीन कानूनी रूप से खरीदी थी। आरोप है कि साल २०११ में ‘स्वयं बिल्डर्स’ और स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से इस जमीन के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। मूल मालिक को बिना भनक लगे इस जमीन को दो भागों में बांट दिया गया, जिसका आधा हिस्सा (१,४०५) वर्ग मीटर स्वयं बिल्डर्स और बाकी का हिस्सा (१,४०५) वर्ग मीटर सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन कंपनी के कब्जे में दिखा दिया गया।
‘अदृश्य शक्ति’ के बल पर
५०-५० का खेला?
जब देश के सबसे ताकतवर पद पर बैठे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हस्तक्षेप करें, तो माना जाता है कि न्याय तुरंत मिलेगा, लेकिन इस जमीन घोटाले में जो कुछ हो रहा है, उसने महाराष्ट्र के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में बैठी एक ‘अदृश्य शक्ति’ की ताकत को उजागर कर दिया, जिसके बल पर भाजपा विधायक की कंपनी ने केवल एक ‘सुरक्षित एग्जिट’ लिया है, जबकि न्याय की मूल आत्मा को ५०-५० के नए खेल में उलझा दिया गया है। ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बेहद करीबी माने जाने वाले नरेंद्र मेहता के अवैध कार्यों को लंबे समय तक प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा है।
असगर वोरा का ठाणे जिलाधिकारी को पत्र
वोरा ने ठाणे जिलाधिकारी से मांग की है कि २०१५ में स्वयं डेवलपर्स के ललहीभाई सोलंकी और अन्य आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की चार्जशीट तुरंत दाखिल कर कड़ी कार्रवाई के अलावा इस पूरे जमीन घोटाले और फर्जीवाड़े में पर्दे के पीछे से सहयोग करने वाले अन्य सभी सहयोगियों और सफेदपोशों के नाम भी में शामिल किए जाएं।

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