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गांधीवाद की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है!

लोकमित्र गौतम

साल 1996-97 में जब मैं मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी से गांधियन थॉट पर एमए फर्स्ट ईयर की डिस्टेंस एजुकेशन के तहत पढ़ाई कर रहा था, उन दिनों गांधी और गांधीवाद को एक पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ते हुए मेरे मन में हमेशा दो सवाल उठा करते थे। पहला यह कि आखिर गांधी दुनिया में कब तक प्रासंगिक रहेंगे? और दूसरा यह कि क्या वाकई गांधीवाद जैसी कोई चीज है जैसे- पूंजीवाद, समाजवाद और मार्क्सवाद हैं ?
ये सवाल केवल 30 साल पहले ही दिल-दिमाग को नहीं मथा करते थे, आज भी दिलो-दिमाग में इन्होंने कब्जा जमा रखा है। क्योंकि दुनिया में जब से इंसान का अस्तित्व है, तब से आज तक जितने भी विचार अस्तित्व में आये हैं, सभी के साथ उनकी एक एक्सपाइरी डेट नत्थी रही है। भले किसी की एक्सपाइरी डेट देर से आयी हो या किसी के बारे में हमें देर से पता चला हो। लेकिन गांधीवाद एक ऐसा दर्शन है, जिसके अस्तित्व के बारे में अब तक के अनुभव से साफ़ है कि इसकी कोई एक्सपाइरी डेट नहीं है, न हो सकती है। पहले सवाल के इसी जवाब में दूसरे सवाल का भी जवाब निहित है। सरल शब्दों में कहें तो गांधी तब तक प्रासंगिक रहेंगे, जब तक जीवन है, धरती है, दुनिया है।
सच बात तो यह है कि गांधीवाद कोई दर्शन ही नहीं है। दुनिया में जो कुछ भी सच है,सहज है, जेनुइन है, कुदरती है या कुदरत के साथ एडजेस्टेबल है, वह सब गांधीवाद है। अगर हम गांधीजी के बारे में गहराई से सोचें तो पायेंगे कि वह अपनी जादुई धारणाओं के बुखार से तपते कोई विचारक नहीं हैं। गांधी, जीवन को इतनी सहजता से जीने के हिमायती थे कि उनका समूचा दर्शन कुदरत की गति के साथ लयबद्ध है। यही वजह है कि गांधी के अंदर न तो कोई बेचैन राजनेता दिखता है और न ही ताकत दिखाने को आतुर कोई योद्धा । उनकी तमाम लड़ाईयां, सुधार, विद्रोह हमेशा एक साथ चलते रहते हैं। वह महज आजादी के सेनानी नहीं थे,इसके साथ साथ वह छूआछूत, हिंदू, मुस्लिम वैमनस्य मिटाने, ग्राम स्वराज, प्राकृतिक चिकित्सा तथा इंसान और इंसानियत को निखारने वाली शिक्षा के लिए भी जंग लड़ रहे थे।
वह इन सभी लड़ाइयों को न केवल लड़ रहे थे बल्कि इन्हें हर हाल में जीतना भी चाहते थे। जबकि उसी दौर में इन अलग अलग मोर्चों पर बहादुरी से लड़ रहे तमाम लोग उनसे मतभेद रखते थे। यहां तक कि बड़े विचारकों में भी यह विराट एकता नहीं थी, मसलन अंबेडकर, छूआछूत, अस्पष्टता और जातिवाद से तो लड़ रहे थे, लेकिन समाज की व्यापक आर्थिक संरचना, भविष्य की शिक्षा जो इंसान को बेहतर बनाए, इन सब मोर्चों पर उनके विचार या तो अंग्रेजों के साथ थे या थे ही नहीं । गांधी अकेले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी जंग के दर्जनों मोर्चे थे और सभी मोर्चों में वह उतनी ही गहरी भावनात्मकता के युद्धरत थे।
हर मोर्चे पर टांग अड़ाने के कारण गांधीजी जीते जी भी कोई बहुत लोकप्रिय नहीं थे। मगर उनका आदर्शवाद इतना बड़ा और खरा था कि उनकी नैतिक आभा और चरित्र के सामने कोई दूसरा टिक ही नहीं पाता था। इसलिए लोग गांधी का विरोध करने से बचते थे या डरते थे, वरना तो गांधी के साथ रहने वाले भी तमाम लोग गांधी से असहमत रहते थे या उन्हें अव्यवहारिक और भटका हुआ मान लेने का आसान रास्ता चुन लेते थे। हमारी आजादी के तमाम ऐसे नायक हैं, जो अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए तो लड़ रहे थे, लेकिन खुद अपने घरों, अपने समाज में निम्न और वंचित जाति के लोगों को आजादी देने के पक्ष में नहीं थे। आजादी के अनगिनत ऐसे यौद्धा थे,जो छूआछूत पर यकीन करते थे। जो पारंपरिक ऊंच-नीच पर आधारित जाति व्यवस्था के हिमायती थे। जो ऐसी शिक्षा के पक्षधर से जो उन्हें आम लोगों से अलग,ताकतवर और प्रभावशाली बनाए। गांधी के इन सभी लोगों के साथ सीधे मतभेद थे। लेकिन गांधी इतने बड़े और ताकतवर थे कि उनके ये विरोधी, उनसे मतभेद रखने की हैसियत ही नहीं रखते थे, लेकिन ये तमाम लोग थे गांधी के छिपे हुए विरोधी।
गांधीजी को आइंस्टीन ने चलता-फिरता चमत्कार कहा था। वह हर रोज सैकड़ों लोगों से मिलते थे। मिलने वालों से वह सत्य और अहिंसा को बार बार रेखांकित करते थे। लेकिन उनकी ये बातें या चीजें कुछ लोगों को ही छू पाती थीं, जिन्हें ये बाते छूती थीं उनका कायाकल्प कर देती थीं। मगर ज्यादातर लोगों को छुए बिना ही गुजर जाती थीं। दरअसल, जिन लोगों के अंदर एक स्वभाविक ईमानदारी, जिज्ञासा, संवेदना और कुदरती सकारात्मकता मौजूद होती थी, वे लोग गांधी का स्पर्श पाते ही सोने में तब्दील हो जाते थे। वे गांधी का सिरा छूते ही रिचार्ज हो जाते थे। लेकिन जो लोग बहुत बुद्धिमान थे, मगर उनके अंदर ये सहज स्वभाविक कुदरती ईमानदारी नहीं थी, वो लोग पूरे अभिनय से भले गांधी और गांधीवाद के साथ अपने को दर्शाते रहे हों, लेकिन गांधी और गांधीवाद कभी उनके गले के नीचे कभी धंसता था। इसीलिए तब भी बड़े पैमाने पर गांधीजी का लोगों पर असर नहीं होता था, भले वो प्रभावित होने का नाटक करते थे।
ऐसा इसलिए भी था क्योंकि गांधी के पास किसी सफलता का कोई बना बनाया फार्मूला नहीं था। गांधी जिंदगीभर अपने जीवन को, अपनी सत्य की प्रयोगशाला में परखते रहे। गांधी के पास साम्प्रदायिकता से निपटने का या साम्प्रदायिकता को परास्त करने की कोई करिश्माई विद्या नहीं थी । वह बार बार साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने के लिए खुद को जोखिम में डालते थे। शायद बहुत कम लोगांे को पता हो कि गांधीजी नोवाखली में करीब करीब लिंच होते हुए बाल बाल बचे थे। जब राजधानी दिल्ली में पहले स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां चल रही थीं, उस समय गांधीजी दिल्ली से बहुत दूर नोवाखली में साम्प्रदायिकता से निपटने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया था। वह बस सैकेंड के सौवें हिस्से के बराबर समय से बच गये, वरना तलवार से उनका सिर उनके धड़ से दूर छिंटक गया होता।
खुद को जोखिम में डालने से गांधी बाइचांस बच ही नहीं गये बल्कि उनकी दृढ़ता और खुद को दांव पर लगाने का यह दुस्साहस नोवाखली में दंगों को भी रोक दिया था। जलता, सुलगता नोवाखली शांत हो गया। इतना शुद्ध, इतना सादा, जिसमें अपने प्रभाव को जमाने का जादू न हो, क्या ऐसा व्यक्ति किसी भी दौर में अनुकरण के लिए आसान होता है? गांधी जितने कठिन अपने जीते जी थे, आज भी उतने कठिन हैं। उनके पदचिन्हों पर चलना,उनके जीते जी उनके साथ चलने, से कम कठिन नहीं। गांधी के पक्ष में बने रहना और दुनियादारी के लिए व्यवहारिक बने रहना, यह दो विपरीत बातें हैं। इसलिए गांधी का अनुकरण करना, न तब आसान था, न आज है । आज नामभर की भिन्नता के साथ सभी राजनीतिक पार्टियां एक हैं। भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में न तो किसी किस्म का वैचारिक मतभेद है और न ही ये अपनी चाल ढाल या रंग ढंग में एक दूसरे से भिन्न हैं। इसलिए सभी राजनीतिक दल और उनके नेता न सिर्फ गांधी को इग्नोर करते हैं बल्कि सभी गांधी को महान बताने और बनाने की हल्लाबोल कोशिश में भी साथ साथ लगे होते हैं।

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