-मुंबई को निजी हाथों में बेचने की महायुति सरकार की चाल
-२२ बस डिपो के पुनर्विकास पर बवाल
-९९ साल की लीज को लेकर सरकार घिरी
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की जीवनरेखा माने जाने वाले बेस्ट उपक्रम की १४० एकड़ बहुमूल्य भूमि पर बने २२ बस डिपो के पुनर्विकास को लेकर महायुति सरकार के निर्णय पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि सार्वजनिक संपत्ति को पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है, जिससे अडानी समूह की साझेदारी वाली कंपनी को लाभ पहुंच सकता है।
घाटे का हवाला, जमीन के निजीकरण का रास्ता
बेस्ट समिति की बैठक में उपक्रम पर रु.७,४२२ करोड़ के घाटे और रु.१४,९२२ करोड़ की देनदारियों का उल्लेख करते हुए पुनर्विकास की आवश्यकता बताई गई। प्रस्ताव के अनुसार, २२ बस डिपो की जमीन ९९ वर्ष की लीज पर निजी भागीदारी के माध्यम से विकसित की जाएगी। विरोध करने वाले सदस्यों का कहना है कि वित्तीय संकट को आधार बनाकर मुंबई की बहुमूल्य सार्वजनिक संपत्ति निजी कंपनियों को सौंपने की भूमिका तैयार की जा रही है। उनका सवाल है कि ९९ वर्ष की लंबी लीज के बाद इन जमीनों पर बेस्ट का वास्तविक अधिकार कितना प्रभावी रहेगा।
शिवसेना का विरोध
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के समिति सदस्यों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। समिति सदस्य नितिन नांदगावकर और प्रवीणा मोरजकर ने आरोप लगाया कि पर्याप्त पारदर्शिता और स्पष्ट शर्तों के बिना इतनी मूल्यवान सार्वजनिक संपत्ति निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है। उनका कहना है कि मुंबईकरों की संपत्ति से जुड़े ऐसे निर्णय पूरी पारदर्शिता और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर ही लिए जाने चाहिए।
