एड. राजीव मिश्र मुंबई
मदनलाल के मेहरिया एक महीना से मदनलाल के पीछे परी है। घर मा बैठि के मटरगश्ती करत हौ, जाओ दुइ पइसा कमाओ। दुइ-दुइ ठो लड़िका हैं उनकर पढ़ाई लिखाई, देखरेख वैâइसे होइ अउर आज तो हद्दय होइ गय जब मदनलाल के मेहरारू फूलमती खानय नहीं बनाई। अइसन ठइचा फानिके बैठी अहइ कि पूछबय नहीं करो। सुबह-सुबह फूलमती मदनलाल के खरी-खरी सुनाय दिहिन या तो कुच्छउ काम करो नहीं तो घर मा न खाना मिली न पानी। अउर तो अउर इहां तक कइ दिहिस कि नौकरी करो नहीं तो हम अपने नैइहर चली जाबय। बिना खाना-पानी के मदनलाल एकदम छटपटाय के रहि गए अउर तय किहिन की कल होत सबेर नौकरी हेरय निकरि जाब। जब तक काम न मिली घरय नही लउटब। ई सोच के मदनलाल चारपाई पर पसरि गएं। रात में सपना में अमेरिका पहुंचि गए। अमेरिका पहुंचि के सड़क पे गोरी मेम के हाथ में हाथ डारे मदनलाल वाशिंगटन की सड़कन पर घुमि रहें हैं। `डू यू लाइक चटनी’ बर्गर खात-खात मेम मदन से पूछिस। `यस-यस आई लाइक चटनी विद पिज्जा। बट दिस इज बर्गर बेबी। जवन भी होय तू समझि गइलू न? बस होइ गा। या-या, आई वैâन। मदनलाल, टुम इंडिया में क्या करता है? हम….हम तो अइसन कउनउ बिसेस काम नहीं करत हैं पर काम खोजि रहा हई। `हाउ स्वीट’ गोरी मेम मुस्कियात बोली। टुम कितना हैंडसम है मैन? टुम हमारे ऑफिस में काम करेगा? काहें न करब, जब कामय करे के है तो तुम्हरे हियां तो एकदमय नीक रही। गुड-गुड, कल अमारा ऑफिस में आ जाना। ऑफिस पहुंचतय गोरी मैम, मदनलाल के दूनउ हाथ पकरि के अपनी ओर खींची और गले लगाय लिहिन। मदनलाल के अइसन लागि जइसन कउनउ खुशबू तन-मन में बसी गइ होय। बदले में उहौ गोरी मैम के कसिके अकवारी में भरि लिहिन। तब तक मदनलाल के लाग केउ उनके ऊपर पानी फेकि दिए होय। आंख खुली तो गोरी मैम की जगह फूलमती चंडी रूप मा खड़ी मिलिन। ई तकिया का अकवारी में लइके मुस्कियाय रहे हौ? फट्टय उठो अउर निकरो घर से अउर बिना नौकरी के घर आयो न। आखिर में मदनलाल एक झटके में वाशिंगटन से बसेहटी खटिया पर गिरि पड़े।
