मैक ब्रो
खिलाड़ियों को तैयार करना, उन्हें प्रोत्साहित करना और देश के लिए मेडल जितवाना, ये सब तो आम खेल संघों के काम हैं। हमारा ‘रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (डब्लूएफआई) तो लीक से हटकर काम करता है। उसका असली काम अखाड़े के बाहर ‘टशन’ दिखाना और अपने ही देश के चैंपियनों के खिलाफ ‘मल्लयुद्ध’ लड़ना है।
विनेश फोगाट ने जब देश के लिए मेडल जीते, तब तो सबने तस्वीरें खिंचवाईं। लेकिन जैसे ही उन्होंने और उनकी साथी महिला पहलवानों ने तत्कालीन संघ प्रमुख के खिलाफ यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए, मानो फेडरेशन की दुखती रग पर हाथ रख दिया गया हो। फिर क्या था? खिलाड़ियों को इंसाफ देने के बजाय, पूरा सिस्टम ही बिफर गया। राजनीतिक शह और रसूख के ऐसे दांव-पेच चले गए कि अखाड़े के दांव भी छोटे पड़ जाएं।
फेडरेशन का नया कल लिखित नियम बना दिया, ‘खिलाड़ी का काम सिर्फ मेडल लाना नहीं, हमारे अहंकार के आगे सिर झुकाना भी है।’
विनेश को रोकने के लिए फेडरेशन ने हरसंभव पैंतरा आजमाया। दिल्ली हाई कोर्ट ने जब विनेश के हक में फैसला सुनाया तो आम इंसान शर्म से पानी-पानी हो जाता, लेकिन हमारी फेडरेशन की ‘मस्ती’ और हेकड़ी तो देखिए! वे अपनी बुनियादी जिम्मेदारियां भूलकर, देश का पैसा और समय बर्बाद करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए। ऐसा लग रहा था जैसे कोई विदेशी दुश्मन देश की सीमा पर खड़ा हो, जिसे रोकने के लिए सर्वोच्च अदालत जाना बेहद जरूरी था।
लेकिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने डब्लूएफआई की इस जिद को जो ‘पटखनी’ दी है, उसने फेडरेशन को उसकी असली औकात याद दिला दी है। अदालत ने साफ कहा कि विनेश ने देश का सिर ऊंचा किया है। अब देखना यह है कि इस करारी शिकस्त के बाद भी फेडरेशन को थोड़ी ‘खेल भावना’ समझ आती है या वे अगले किसी दांव-पेच की तैयारी में जुट जाते हैं। आखिर, ‘हम नहीं सुधरेंगे’ का बोर्ड जो लगा रखा है!
