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बेबाक : १० साल की कड़ियां और मात्र १२ घड़ियां?.. ‘सत्य’ की नब्ज और नेता की नैतिकता कहीं तो जिंदा है

अनिल तिवारी, मुंबई

दस साल पुराने एक कथित भर्ती घोटाले की जांच जब आखिरकार हरीश रावत के पुराने सहयोगी चंदन सिंह जीना के घर तक पहुंची, तो देश को बताया गया कि उनसे ३२ लाख रुपए नकद, करीब २० तोला सोना और १२ ‘लग्जरी’ घड़ियां बरामद की गई हैं। घड़ियां भी ऐसी कि जिनकी कीमत का मूल्यांकन अलग से ‘समय’ मांग रहा है! अर्थात १० साल का सफर अब भी अंजाम को तरस ही रहा है। वाह री जांच और वाह रे मूल्यांकन!
खैर, जब मामला ईडी का है, आरोप भी ईडी का है तो मान लीजिए ‘गंभीर’ है। मान लीजिए ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा की ओएमआर शीटों में कथित हेरफेर हुई, अभ्यर्थियों से अवैध रकम वसूली गई और बिचौलियों के जरिए पैसे भी पहुंचाए गए। यह सब सच है तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, युवाओं के भविष्य की सीधे-सीधे चोरी है। इसके दोषियों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए थी। तब इतनी देरी क्यों हुई, १० साल की देरी? न खाऊंगा, न खाने दूंगा वाले राज में १० साल की देरी के बाद छापे? क्या ईडी जेन जी के आंदोलित होने का इंतजार कर रही थी या नीट कांड से सामंजस्य बिठाने की तैयारी? हो सकता है वर्षों से मंथन हो रहा हो कि हिसाब तो बराबर के अनुपात में ही होना चाहिए।
आज जब देश में १२ वर्षों के कामकाज के मूल्यांकन का दौर शुरू हुआ तो पहाड़ों में २०१६ के कथित भर्ती घोटाले की १० साल लंबी चढ़ाई १२ घड़ियों पर आकर टिक गई? सिस्टम की सांसें घड़ियों की टिक-टिक में रुक गई? लिहाजा, सवाल यह नहीं कि घड़ी रोलेक्स की है, राडो है, पीजेट है या टिस्सॉट। सवाल यह है कि दस साल पुराने और इतने बड़े कथित भर्ती घोटाले की मनी-ट्रेल आखिर है कहां? जो जीना का जीना दुश्वार करने के लिए सबसे अहम कड़ी है वो क्या केवल ये १२ घड़ी हैं? और अगर भर्ती घोटाला इतना ही व्यापक था, तो दस साल बाद उसका आर्थिक चेहरा केवल ३२ लाख नकद, २०० ग्राम सोना और १२ घड़ियों में वैâसे सिमटा रह गया? ईडी ने जीना और उनके परिवार के बैंक खातों में मौजूद करीब ५२.१६ लाख रुपए तो प्रâीज कर दिए पर आश्चर्यजनक ढंग से उसे किसी और का अकाउंट प्रâीज करने लायक नहीं नजर आया। एजेंसी ने नकद, सोना, घड़ियों और बैंक बैलेंस को मिलाकर मौजूदा जब्ती/प्रâीज का मूल्य करीब १.२८ करोड़ रुपए बताया है। रकम जोड़ने में जुगाड़ की कोई कमी नहीं छोड़ी गई होगी, तब भी रकम घोटाले के आकार में इत्तू सी!
यहां, एक बात और भी है। किसी भी रकम का मिलना और उसका घोटाले की कमाई होना, दो अलग बातें हैं। ३२ लाख रुपए किसी व्यक्ति के पास क्यों थे? वैध आय थी या अवैध? सोना कब खरीदा गया? पारिवारिक था या कथित घोटाले की रकम से आया? घड़ियों के बिल हैं या नहीं? ये सवाल जांच के विषय हो सकते हैं। लेकिन घड़ी दिखाकर भ्रष्टाचार सिद्ध करना जिम्मेदारी का विषय तो नहीं ही है।
राजनीति में बड़े पदों पर रहे लोगों को अक्सर मिलने-जुलने वाले लोग उपहार में वस्तुएं देते रहते हैं। खासकर पुरुष नेताओं के मामले में घड़ी या पेन जैसी भेंट वस्तुएं कोई असामान्य बात नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि ऐसी हर वस्तु किसी भ्रष्टाचार का हिस्सा हो। होली-दिवाली या दूसरे मौकों पर भी घड़ियां उपहार में मिलती ही रहती हैं। यहां, यह भी जरूरी नहीं कि किसी घड़ी पर जिस बड़े ब्रांड का नाम लिखा हो, वह वास्तव में उसी ब्रांड का महंगा और असली उत्पाद हो। बाजार में असली जैसी दिखने वाली डुप्लीकेट घड़ियां भी बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हैं। समय असल में ऐसी ही डुप्लिकेट घड़ियों के मूल्यांकन में लगता है? वरना किसी ब्रांडेड घड़ी की पहचान कोई बहुत जटिल काम नहीं। किसी भी अच्छे शोरूम का साधारण सा सेल्समैन भी कुछ ही मिनटों में बता सकता है कि कोई घड़ी असली है या नकली। फिर ईडी भला इन १२ घड़ियों में आखिर कौन-सा रॉकेट साइंस खोजने के लिए समय लगा रही होगी? १२ घड़ियां दिखाकर किसके १२ बजाने की स्क्रिप्ट तैयार हो रही है यह आज के दौर में किसी से छिपा नहीं है।
यहां एक और गौर करने लायक बात है। मान लीजिए कोई व्यक्ति दस साल पहले करोड़ों के संगठित भर्ती घोटाले में शामिल था। उसने घोटाले में मोटी रकम कमाई। क्या वह अपनी कथित अवैध कमाई को दस साल तक १२ घड़ियों में संभालकर रखेगा? न जमीन? न फ्लैट? न बेनामी संपत्ति? न कंपनी? न निवेश? न शेयर? न रिश्तेदारों के जरिए कोई बड़ा वित्तीय नेटवर्क? यदि वास्तव में ऐसा है तो वह भ्रष्टाचारी कम और दुनिया का सबसे विचित्र निवेश ‘गुरु’ अधिक साबित होगा! फिलहाल यह व्यंग्य है, निष्कर्ष नहीं। असली उत्तर जांच एजेंसी को देना है। देश को यह बताना है कि कथित भर्ती घोटाले में कुल कितने अभ्यर्थियों से पैसे लिए गए? रकम कितनी थी? किन बिचौलियों को मिली? किन अफसरों तक पहुंची? क्या उसका कोई हिस्सा राजनीतिक स्तर तक गया? दस वर्ष में संपत्तियां कहां बनीं? बैंकिंग ट्रेल क्या कहती है? बाकी के नाम और सबूत कहां हैं? दस वर्षों का हिसाब क्या है? यही असली और निष्पक्ष जांच होगी। वरना १२ घड़ियों की तस्वीर चला देना तो आसान है। दस साल की सच्ची मनी-ट्रेल खोजना कठिन। खासकर तब जब खोज बहुत उबाऊ हो।
इस कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है और शायद वही ज्यादा उल्लेखनीय है, हरीश रावत की प्रतिक्रिया। आज की भारतीय राजनीति का सामान्य व्यवहार क्या है? अपने आदमी पर एजेंसी का छापा पड़े तो पहला बयान, राजनीतिक बदला! सहयोगी गिरफ्तार हो तो, हमें न्यायपालिका पर भरोसा है! आरोप गंभीर हों तो, षड्यंत्र! और यदि सत्ता पक्ष से मामला जुड़ा हो तो कई बार नैतिक जिम्मेदारी जैसा शब्द राजनीतिक शब्दकोश से ही गायब हो जाता है। हरीश रावत ने भी ईडी की कार्रवाई की टाइमिंग और राजनीतिक नैरेटिव पर सवाल उठाया। उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। लेकिन उन्होंने वहीं रुकना पसंद नहीं किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि चंदन सिंह जीना उनके महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि जीना ने ओएमआर शीट से छेड़छाड़ की है और उसके प्रमाण हैं तो वह इस कृत्य के लिए लज्जित हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में किसी ‘एरर ऑफ जजमेंट’ की संभावना तक स्वीकार की और उत्तराखंड की जनता से क्षमा मांगी। इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस से जुड़े अपने संगठनात्मक पदों से हटने की इच्छा जताई और यहां तक कहा कि यदि किसी के पास उनकी अपनी संलिप्तता का प्रमाण है तो उसे सीबीआई, ईडी या पुलिस को सौंप दिया जाए। चुप्पी के इस दौर में इस बयान को राजनीतिक नाटक कहकर खारिज करना आसान नहीं है। राजनीति में हर बयान के पीछे रणनीति हो सकती है। लेकिन फिर सवाल यह भी है यदि यह नाटक है तो आज के कितने नेता ऐसा नाटक करने को तैयार हैं? आज राजनीति में आरोप लगने पर पद छोड़ना तो दूर, क्षमा शब्द बोलना भी कमजोरी माना जाने लगा है। इसीलिए इस मामले में एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। कुल मिलाकर ईडी को दस साल पुराने एक मामले में १२ घड़ियां मिलीं पर कड़ियां नहीं मिलीं और उधर, हरीश रावत के आचरण में राजनीति को एक ऐसी चीज मिली जो भारत में आज शायद बेशकीमती घड़ियों से भी ज्यादा दुर्लभ हो चुकी है, नैतिक जवाबदेही की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति।
जीना दोषी हैं या नहीं, यह तो अदालत तय करेगी। हरीश रावत की कोई भूमिका थी या नहीं, यह भी प्रमाण तय करेंगे। ईडी की कार्रवाई हमेशा की तरह राजनीतिक है अथवा पूरी तरह पारस पत्थर के काल्पनिक अस्तित्व की तरह निष्पक्ष, इसका फैसला टीवी चैनलों या सोशल मीडिया के गलियारों में नहीं होगा। लोकतंत्र में एक कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होती है। आरोप सत्ता पक्ष पर हो या विपक्ष पर, जांच साफ नीयत से होनी चाहिए। अवैध धन है तो जब्त हो। दोष है तो सजा हो। लेकिन केवल घड़ी की चमक से घोटाले की कहानी न लिखी जाए। क्योंकि दस साल बाद ही सही, खजाने के तौर पर मिलीं घड़ियां इतना तो बता ही रही हैं कि देश की राजनीति में विपक्ष का ‘समय’ लौट रहा है। विपक्ष की कलाई में नैतिकता की नब्ज अभी जिंदा है।

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