-भाग:६९
-एड. कनई बिस्वास
भारतीय न्याय संहिता, २०२३ न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए ऐसे कृत्यों को अपराध मानती है, जिनसे कानून के पालन में बाधा उत्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति लोक सेवक की वर्दी या पहचान-चिह्न का धोखाधड़ी के उद्देश्य से उपयोग करता है, समन से बचने के लिए जानबूझकर फरार हो जाता है या समन की तामील में बाधा डालता है, तो वह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। धारा २०५, २०६ और २०७ इन्हीं अपराधों से संबंधित हैं।
केस स्टडी-१: ‘लोक सेवक की वर्दी पहनना या पहचान-चिह्न का कपटपूर्ण उपयोग करना’ (धारा २०५)
एक व्यक्ति ने पुलिस की वर्दी पहनकर और नकली पहचान-पत्र दिखाकर लोगों से वाहनों की जांच के नाम पर धन वसूला। शिकायत मिलने पर जांच में पता चला कि वह किसी भी सरकारी विभाग में कार्यरत नहीं था।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने लोक सेवक की वर्दी या पहचान-चिह्न का उपयोग किया? क्या उसका उद्देश्य लोगों को धोखा देना या अनुचित लाभ प्राप्त करना था? क्या उसके पास ऐसा करने का कोई वैध अधिकार था?
फैसला – यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने कपटपूर्ण उद्देश्य से लोक सेवक की वर्दी या पहचान-चिह्न का उपयोग किया, तो उसके विरुद्ध धारा २०५ के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २०५ का उद्देश्य सरकारी वर्दी और पहचान-चिह्न की विश्वसनीयता बनाए रखना है। कोई भी व्यक्ति पुलिस, सेना, राजस्व विभाग या अन्य लोक सेवक की वर्दी या पहचान-चिह्न का धोखाधड़ी के लिए उपयोग नहीं कर सकता।
केस स्टडी-२: ‘समन या अन्य न्यायिक कार्यवाही की तामील में बाधा डालना’ (धारा २०७)
एक व्यक्ति ने न्यायालय के समन की तामील करने पहुंचे कर्मचारी को गलत पता बताया और संबंधित व्यक्ति के परिवार वालों से भी समन छिपाने के लिए कहा। इससे न्यायालय की कार्यवाही में अनावश्यक विलंब हुआ।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी ने समन या अन्य न्यायिक कार्यवाही की तामील में बाधा डाली? क्या उसने जानबूझकर समन की सूचना छिपाई या उसकी तामील रोकने का प्रयास किया? क्या उसके कृत्य से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई?
फैसला- यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी ने समन या अन्य न्यायिक कार्यवाही की तामील में जानबूझकर बाधा डाली, तो उसके विरुद्ध धारा २०७ के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २०७ का उद्देश्य न्यायालय द्वारा जारी समन और अन्य वैधानिक आदेशों की समय पर तामील सुनिश्चित करना है। जो व्यक्ति जानबूझकर इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, वह कानून के अनुसार दंड का भागी होता है।
भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि न्यायिक व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है, जब उसके आदेशों और प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाए। सरकारी वर्दी का दुरुपयोग करना, समन से बचने के लिए फरार होना या न्यायालय की प्रक्रिया में बाधा डालना केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था को कमजोर करने वाले कृत्य हैं। इसलिए इन अपराधों के लिए कानून में दंड का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।
केस स्टडी-२: ‘समन या अन्य न्यायिक कार्यवाही से बचने के लिए फरार होना’ (धारा २०६)
एक व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय ने समन जारी किया। समन की जानकारी मिलने के बाद वह अपना घर छोड़कर दूसरे शहर चला गया और लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा, ताकि समन की तामील न हो सके।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी को समन या न्यायिक कार्यवाही की जानकारी थी? क्या उसने जानबूझकर तामील से बचने के लिए स्वयं को छिपाया? क्या उसके फरार होने के पर्याप्त साक्ष्य हैं?
फैसला – यदि यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपी समन या अन्य न्यायिक कार्यवाही से बचने के लिए जानबूझकर फरार हुआ, तो उसके विरुद्ध धारा २०६ के तहत कार्रवाई की जाएगी। समझें: धारा २०६ यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति न्यायालय की प्रक्रिया से बचने के लिए जानबूझकर फरार न हो। न्यायिक प्रक्रिया से बचना स्वयं में एक दंडनीय कृत्य है।
(अगले अंक में: धारा २०८, २०९ और २१०- लोक सेवक के आदेश का पालन करते हुए उपस्थित न होना, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, २०२३ की धारा ८४ के अधीन जारी उद्घोषणा के बावजूद उपस्थित न होना तथा लोक सेवक को प्रस्तुत किए जाने के लिए विधिक रूप से बाध्य दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख प्रस्तुत न करना से संबंधित अपराधों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे।)
