-डेढ़ साल से नई निविदा का इंतजार; अल्प अवधि के कार्यादेशों के सहारे वसूली की चर्चा, पीडब्ल्यूडी की भूमिका सवालों के घेरे में
सुनील ओसवाल / नई मुंबई
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करते हैं। लेकिन सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधीन आने वाले कामोठे टोल प्लाजा की व्यवस्था इन दावों पर ही सवाल खड़े कर रही है। पुराने ठेके की अवधि करीब डेढ़ वर्ष पहले समाप्त होने के बावजूद नई निविदा प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, ठेका खत्म होने के बाद भी टोल वसूली जारी रहने और अल्प अवधि के कार्यादेशों के जरिए व्यवस्था चलाए जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कामोठे टोल पर आखिर किसका ‘राज’ चल रहा है?
सायन-पनवेल महामार्ग पर स्थित कामोठे टोल प्लाजा से होने वाली वसूली सीधे सरकारी राजस्व से जुड़ी है। ऐसे में ठेका समाप्त होने के बाद नियमित निविदा समय पर पूरी नहीं होना गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े करता है। नई निविदा में देरी क्यों हुई? पुराना ठेका समाप्त होने के बाद टोल वसूली जारी रखने की अनुमति किस आदेश के आधार पर दी गई? इन सवालों के जवाब अब सार्वजनिक होने चाहिए। विभागीय हलकों में चर्चा है कि नियमित ठेके के बजाय अल्प अवधि के कार्यादेशों के माध्यम से टोल संचालन जारी रखा जा रहा है। यदि ऐसा है तो प्रत्येक कार्यादेश की अवधि, संबंधित एजेंसी को किया गया भुगतान, प्राप्त राजस्व और उसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जानकारी सामने आना जरूरी है। बताया जा रहा है कि नई निविदा की पूरी प्रक्रिया मुंबई शहर क्षेत्र के मुख्य अभियंता के स्तर पर पिछले कुछ दिनों से लंबित है। अब यह फाइल कब आगे बढ़ेगी, इस पर भी सवाल खड़ा हो गया है। मामले का सबसे अहम पहलू सरकारी राजस्व है। पुराने ठेके की अवधि समाप्त होने के बाद अब तक कामोठे टोल से कितनी राशि वसूली गई? सरकार के खाते में कितना राजस्व जमा हुआ? संबंधित एजेंसी को कितना भुगतान किया गया? किस अधिकारी ने इन भुगतानों को मंजूरी दी? इन सभी सवालों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग उठ रही है।
सरकारी राजस्व से जुड़ा टोल, लेकिन ठेके का हिसाब अस्पष्ट क्यों? नई निविदा आखिर क्यों अटकी है? डेढ़ साल से चल रही वसूली का पूरा हिसाब कौन देगा? और अल्प अवधि के कार्यादेशों की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? इन सवालों पर सरकार और सार्वजनिक निर्माण विभाग की भूमिका अब सवालों के घेरे में है।
फडणवीस की ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ वाली नीति की असली परीक्षा
सार्वजनिक निर्माण विभाग मंत्री भोसले के अधीन है। ऐसे में विभागीय अधिकारियों के पैâसलों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना भी विभाग की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री की ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ वाली नीति की असली परीक्षा अब कामोठे टोल पर होती दिखाई दे रही है।
