मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिपुस्तक समीक्षा: “मुंबई… बंबई… बॉम्बे..” महानगर की जीवन संस्कृति का दर्पण

पुस्तक समीक्षा: “मुंबई… बंबई… बॉम्बे..” महानगर की जीवन संस्कृति का दर्पण

राजेश विक्रांत

कवि, समीक्षक, कथाकार, गीतकार, संशोधक डॉ. बालासाहेब लबडे का हिंदी में अनुवादित काव्य संग्रह है “मुंबई… बंबई… बॉम्बे..”। यह पुस्तक मूलतः मराठी में ग्रंथाली प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुई थी। इसका दूसरा संस्करण अथर्व पब्लिकेशन, जलगांव से प्रकाशित होकर लोकप्रिय हुआ था। भारत वेडे द्वारा हिंदी में अनुवादित होकर यह पुस्तक लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित की है।
अनुवादक की राय में ये कविताएँ केवल नगर के दृश्यों का बयान नहीं करतीं। शहर के भीतर की आत्मा तक पहुँचती हैं, जहाँ प्रवासी मजदूर की थकान है, कमाठीपुरा की रातों की पीड़ा है, हाजी अली की आरती है, लोकल ट्रेन का धक्का है और समुद्र की बेचैनी भी। मुंबई की वर्ग व्यवस्था व जाति व्यवस्था है। उसकी एक भाषिक अस्मिता है, जहां जीना महंगा है और मरना सस्ता।
साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त विमलेश त्रिपाठी, कोलकाता कहते हैं कि “मुंबई… बंबई… बॉम्बे..” केवल एक महानगर का बहु-नामात्मक संकेत भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय आधुनिकता की उस जटिल और विरोधाभासी यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है, जिसमें औपनिवेशिक विरासत, पूँजीवादी विकास, श्रम-संस्कृति, विस्थापन, धार्मिक आस्था, जातिगत संरचना और वैश्वीकरण की शक्तियाँ एक-दूसरे से निरंतर टकराती रहती हैं। यह काव्य-संग्रह उस शहर को केंद्र में रखकर लिखा गया है, जो भारत के आर्थिक स्वप्न का प्रतीक भी है और उसकी सबसे गहरी सामाजिक विफलताओं का साक्ष्य भी।”
“मुंबई…. बंबई…. बॉम्बे…” की सभी 115 कविताएं मुंबई के विविध रंगी जीवन को दर्शाती हैं। कवि के मुताबिक, “यह कृति मेरे जीवन के उन अनुभवों से उपजी है, जिन्हें मैंने इस महानगर की दिन और रात, भीड़, गलियों और समुद्र की लहरों के बीच जिया है। मुंबई से मेरा नाता लगभग 40 वर्षों का रहा है। 1980 के दशक में मैं भूलेश्वर में बतौर फूल कामगार काम करता था, तब से लेकर आज तक, जब मैं एक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हूँ, मुंबई मेरे अनुभवों का, मेरे विचारों का, मेरे सपनों और संघर्षों का हिस्सा बनी हुई है। मैंने इस शहर की दिन की चमक और रात की छाया दोनों को बहुत करीब से देखा है। झोपड़पट्टियों में, गलियारों में, नालों के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन की वास्तविकता को मैंने महसूस किया है, अनुभव किया है। ‘मुंबई’ मेरे लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है— एक ‘महामाया’, ‘एक स्वप्न नगरी’, ‘चंदेरी नगरी’, एक ‘महामिथक’। यहां का हर मोड़, हर गली, हर सांस एक कविता बन सकती है। यहां का हर एक कोना कविता और साहित्य का विषय है। यह शहर एक मिनी इंडिया है, एक मिनी वर्ल्ड, जहां असंख्य जातियां, धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां मिलकर एक जीवंत कोलाज बनाती हैं।”
“मुंबई…. बंबई…. बॉम्बे…” में एलिफंटा केव्ज़, मरीन लाइन, फोर्ट की सड़ियाँ, स्वप्न नगरी काला घोड़ा, महालक्ष्मी, हाजी अली, राजाबाई टॉवर, लालबाग की लॉटरियां, फैशन स्ट्रीट, धारावी, सायन कोलीवाड़ा, शिवाजी पार्क, कबूतरखाना, फूलगली, चैत्यभूमि, बैंड स्टैंड, मीठी नदी, माहिम खाऊ गली में रहभान भाई से मुलाकात, ससून डॉक, भिंडी बाजार की बुढ़िया, धोबीघाट, अंधेरी: नौटाक राजा, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, बोरीवली फास्ट, भाईंदर वीडियो सेंटर, गोरेगांव पक्षियों की रिंगटोन, हीरानंदानी के चौथे माले पर, जनता मार्केट तुर्भे, ठाणे डंपिंग ग्राउंड, मुंबई के भाई लोग, भाऊ का धक्का, मुंबई के दावेदार, मेगा ब्लॉक, घारापुरी, मुंबई के अभंग, मुंबई.. बंबई.. तथा त्यागकर दादर जाएंगे पनवेल में आदि कविताएं हैं।
कविता ‘मुंबादेवी’ इस प्रकार है–
सहस्त्र भुजाओं में/ शस्त्र धारण कर/ कृपा करने हेतु/ तुम होती उपस्थित/ महाअंबा/ उत्पत्ति, प्रगति और गति, तुम्हारे तीनों रूप परिवर्तित होते हैं/ मनुष्य के जीवन की ऋतु/ फटी लीर हुई चादर में दुबक जाते हैं/ असीमित सपनों के मनोवांछित पत्थर/ अस्तित्व शून्य, दरिद्र, दुखी, विस्थापित, संध्या में प्रकाशित तुम्हारे दृष्टि-साक्ष्य से/ जीवन की कल्पनाओं के पंख के साथ/ मनुष्य उड़ने लगते हैं हवाओं पर/ तुम्हारे कृपारूपी वरदान/ हर एक के मस्तक पर/ यतन प्रगति के अनेक पंखों से/ नश्वर मनुष्य का/ तुम होती हो स्वप्न नगरी, माया नगरी, सरस्वती, पथ प्रार्थना में पागल रहता है/ पवित्रता के स्रोत/ व्याप्तता की भीड़ के करतल ध्वनि पर/ तेरी आरती गाती/ प्रसाद के अंबार के बीच से/ अनेक अंगों से, अनेक रंगों से/ घटित उद्यम एवं हस्तमुखों की क्रियाएं/ तूफान में जुओं की एवं हाथ भट्टियां/ लोग अर्पित करते हैं सिक्के लक्ष्मी मानकर, धूप आरती, मंगल आरती, झोपड़ियों में/ श्रमिकों के पसीने में तर मालाएं/ कंठ में नारियां भरती हैं/ आंचल अपने पूजा सामग्री द्वारा, संध्या पूर्व रेड लाइट एरिया के माध्यम से कभी भोग को, कभी त्याग को, कभी शक्ति को, कभी रति को, कभी व्यापक विस्तार को आत्मसात कर लेने वाली/ तू लक्ष्मी सुंदर-सुंदर मंजिलों की/ नथ नाक में धारण, पग में शरण असुर मोह-माया के, प्रत्येक समय में/ नगर को आए जाग नाले, परिवर्तित करते अपनी करवट, तू पार्वती शंकर की तरह, कर में शस्त्र लेकर/ मस्तक पर संहार का लगाकर भस्म, नेत्र का क्रोध करता तांडव/ मंगल कामना के जतन हेतु/ तेरे रूप शोभा देते, गलियों में से मछुआरों का आक्रोश, अपने अस्तित्व हेतु सनातन शोर/ “हम पहले से हैं! हम पहले से हैं!” पुनः विस्थापित होता, यह स्वयं ही करवट/ “हम हैं नाभि उद्गम केंद्र से” हे मुंबा देवी! मैं तुझे देखता हूं! तेरी नजर में! तू मेरी नजर में समाती नहीं!”
एक अन्य कविता ‘लोकल की संगत से’ में कवि का पर्यवेक्षण इस प्रकार है-
ढिंचक ढिंचक बजे/ करताल मृदंग माधुरी/ भीड़ की श्रद्धा की बहुत और श्रम की पड़ी उलझन/ तनिक चमका पैसा/ नयन अंधे नाचे/ गा सके भले पर चक्की का खाएंगे/ भूखा निकला मैं/ भोले शंकर का लगाया भस्म/ ललाट चिल्लाकर शोर करने लगे/ हाथ पहुंच रहे हैं/ धीरे से प्राप्त करेंगे स्थान/ नींव रखी जोश में, पर धन है तो धकेल देने हेतु/ जाने दो उनको, कोमा में गड़बड़ी देहरी पर है/ पाने की यह कोशिश पवन पर चलती है/ मृतकों की बुदबुदाहट/ अंतर में कैद किए सांस, छलती भूख नयन से/ खरीद लिए दाने, चार ही नमकीन/ चाव से मुख के डाकू यह तंबाकू, बात एक चुटकी की चबाकर वर्तमान, प्रश्न का आखरी छोर चूने का/ लोकल की संगत से, मृत्यु का है समय/ हस्तमुख के खेल में यह, जीवंतता का तालमेल।
डॉ. बालासाहेब लबडे जीवनानुभवों के कवि हैं। ‘कोड लैंग्वेज’ में उनके शब्द तीखे हैं-
शाम के लबादे हँसे, भोग में कोई गूंगे/
वस्त्रहीन प्लॅटफॉर्म के, अभंग समस्त सड़ गए/ आज क्या है नया बंधु, मलबारी अम्मा ड्रग्ज/ थोड़ी रिश्वत/ सायकल पर धुत्त सिगारवाला, हुक्के हेतु है अंधेरी/ बबन्या मुलुंड नाका, चखना है डांस बार/ हमसफर हमसाया, जाएंगे जोगेश्वरी पार/ कोती होती है लोकल, शब्द प्रकाश में आधार/ नगद से खरीदे हुए वस्त्र, न मांगो उधार/ समस्त रिपु को बेचेंगे, भंडार मुक्ति के बांटेंगे, जो कभी नहीं असत्य, वो सत्य सुख से बांटेंगे।
मुंबई पर गंभीर कविताओं के शौकीनों को यह पुस्तक अवश्य पसंद आएगी। 182 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 399 रुपये है।

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