सेतु!

‘स’ से बनता ‘से’ जो जुड़ता है अन्य से
‘तू’ हो ‘ तुम’ कुछ अलग हो सबसे
दो सिरों को जोड़ता जो वह सेतु कहलाए
सेतु करता दो को संलग्न, मेल मिलाए
गिर, भूमी, सरिता, सागर नहीं मिलते जिनके अंतिम छोर
इन्हीं तीर, तटों, कगारों के सिरों को मिलाएं
दूरियां समय परिश्रम कम कर पाए
सेतु बनते मिट्टी, पत्थर, काष्ठ, लोह, ईंट-गारे से
‘रामसेतु’ ने युग त्रेता में भारत-श्रीलंका को जुड़ाया
नल नील के पुरुषार्थ ने राम सेना को श्रीलंका पहुंचाया
देश-विदेशों में बहुत से सेतु विख्यात हुए
अलग-अलग श्रेणी में रह नाम पाया
साधना-भक्ति दोनों सेतु सम
भक्त को अपने ईष्ट से मिलाए
परस्पर विश्वास का सेतु
परिवार जनों को समीप ले आए
गुरु को दिया यथार्थ सम्मान तो
शिष्य पूर्ण ज्ञान पा जाए
नि:स्वार्थ सेवा भाव जन मानस की
मानवता में प्रभुता को पा जाता
पीड़ा बनती सेतु सब पीड़ित मनों में
एक-दूसरे के सहायक बनते
बड़े-बूढ़ों की सेवा, आशिर्वाद भी सेतु है
घनेरे कुकर्मों से बचाते
प्रत्येक जीव से करना प्रेम, मानव के गुण बढ़ाए
नम्रता, क्षमा, सेवा, दान अंतर्रात्मा को जगाए।
-बेला विरदी

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