विकास की कीमत

कभी बाढ़ की लहरें उमड़ पड़तीं,
कभी धरती हिलकर चेतावनी देती।
पर्वतों से चट्टानें लुढ़क जातीं,
नदियां गांवों की नींदें हर लेतीं।
विज्ञान ने दी हमें नई दृष्टि,
जो पढ़ सके आसमान की हर चाल।
बरसात का अंदाजा पहले से है,
फिर भी क्यों चूकते हर बार?
जंगल कटे, पहाड़ हुए खोखले,
लालच ने किया धरती को असहाय।
भूस्खलन में ढहते घरौंदों ने,
जीवन का हर रंग फीका किया।
भूकंप की थरथराती रातें,
हर बार हमें याद दिलाती कि
नियम बनाए हैं सुरक्षित रहने को,
पालन की राहें सूनी हैं सूनी।
जब तक चेतना को न देंगे व्यवहार,
हर साल त्रासदी के आंसू बहेंगे।
प्रकृति से संवाद ही है समाधान,
संवेदनशील विकास ही है सच्चा विधान।
-मुनीष भाटिया
मोहाली

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