मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : नए भारत के लोकतंत्र में बड़ा सवाल!

दिल्ली लाइव : नए भारत के लोकतंत्र में बड़ा सवाल!

अरुण कुमार गुप्ता

कल दिल्ली के जंतर मंतर से संसद तक का सीजेपी के मार्च को बहुत से लोग जो बीजेपी के सपोर्टर भी नहीं हैं, फिर भी डीसक्रेडिट करने में जुटे हुए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी या शिक्षाविद, पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो या न हो, लेकिन यह क्या कम है कि उनकी मांग पर इस देश के युवा खड़े तो हुए हैं। इस देश के युवा करें तो क्या करें? जिस देश में १०० से अधिक पेपर लीक हो जाए। कोई ऐसा राज्य नहीं बचा जहां पेपर लीक न हुआ हो। कोई ऐसा आयोग नहीं बचा जहां पेपर लीक न होता हो। कहीं गलती से पेपर ठीक भी हो जाए तो छात्र दो-दो साल तक रिजल्ट का इंतजार ही करते रहते हैं। रिजल्ट आ भी जाए तो जॉइनिंग का सालों तक इंतजार करते रहते हैं। अभी हाल ही में नीट का पेपर लीक हुआ। उसी को लेकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा जा रहा है। इसी बीच री-नीट की परीक्षा हुई तो ठीक से करवा दिया गया, लेकिन रिजल्ट में गड़बड़ी कर दी गई। किसी की मार्कशीट के हिसाब से ६०० नंबर बनते हैं तो उसे डेढ़ सौ नंबर दिए गए। इतनी खस्ता हाल में पहुंच चुकी है हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था। जब लोग विरोध प्रदर्शन करते हैं तो उनसे पूछा जाता है कि क्या आपको डर नहीं लगता। अब आप सोचिए, अपने ही देश में किस बात का डर? क्या आपको नहीं लगता कि इस डर के पीछे नरेंद्र मोदी और अमित शाह खड़े हैं। देश में राम मंदिर के साथ-साथ युवाओं की मेहनत की लूट हो रही है। वोट चोरी के साथ-साथ पेपर चोरी हो रही है। इस लूट और चोरी का विरोध करने और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने वालों को डर लगेगा क्या? नए भारत के लोकतंत्र में यह बड़ा सवाल है।
क्या इसरो भी राष्ट्रीय सेठ की झोली में जाएगा?
जिस देश का प्रधानमंत्री नाले की गैस से चाय बनाने की बात करता हो। जिस देश का प्रधानमंत्री भगवान गणेश को प्लास्टिक सर्जरी का अद्भुत नमूना बताता हो। जिस देश का प्रधानमंत्री बादलों की वजह से रडार से बचने का बेनिफिट लेने की बात करता हो। उसी देश में वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिकों की हालत सभी के सामने है। एक तरफ लद्दाख में बर्फ का स्तूप और भारतीय फौज के लिए सोलर टेंट का आविष्कार करने वाले सोनम वांगचुक अपनी ही जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। दूसरी तरफ सैकड़ो वैज्ञानिक इसरो को छोड़कर जा रहे हैं। बीते कुछ महीनों में १०० से ज्यादा वैज्ञानिक इसरो छोड़ चुके हैं, क्योंकि इन्हें यहां से बेहतर सैलरी और सुविधाएं प्राइवेट सेक्टर में मिल रही हैं। इसरो में कई वैज्ञानिकों की सीट खाली होने से बचे हुए वैज्ञानिकों पर भारी वर्कलोड आ गया है। सोचिए, इसरो न हुआ सरकारी भर्ती परीक्षा हो गई है कि सरकार खाली सीट ही नहीं भर पा रही है। वैज्ञानिकों को बेहतर सैलरी और सुविधाएं देने के बजाय सरकार फरमान जारी करती है कि अब डायरेक्ट इस्तीफा मंजूर नहीं कर सकते, बल्कि केंद्र सरकार करेगी। हालत यह है कि इसरो ने अप्रैल २०२६ से मार्च २०२७ के बीच १३ स्पेस लॉन्च का टारगेट रखा है, लेकिन इस साल अभी तक मात्र एक लॉन्च हुआ है। वह भी सफल नहीं हुआ। पहले शिक्षा की कमर तोड़ी गई ताकि छात्र फांसी से लटक जाएं, फिर देश के जवानों को पानी वाली दाल खिलाई गई। चंद्रयान के इंजीनियरों को १८ महीने तक सैलरी नहीं दी गई। अब क्या इस देश के वैज्ञानिक सब कुछ खत्म होने के बाद राजपथ पर गलबहिया डालकर वंदे मातरम गाएं। इन सब बातों से तो यही प्रतीत होता है कि शायद इसरो भी राष्ट्रीय सेठ की झोली में डालने की तैयारी है।

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