महाराष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था कभी देश में सर्वश्रेष्ठ हुआ करती थी। संघ लोक सेवा आयोग पास करनेवाले अधिकारी महाराष्ट्र में काम करने का मौका पाने के लिए दौड़-भाग करते थे। मंत्री प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे और न ही अधिकारियों पर अपने लोगों के लिए अवैध काम करने का दबाव बनाते थे, क्योंकि राज्य का नेतृत्व करनेवाले लोग इतने समर्थ थे। अब महाराष्ट्र की तस्वीर बदल गई है। जिस तरह मनोज जरांगे-पाटील की ‘वर्षा’ बंगले में राज्य के मुख्यमंत्री को सबक सिखानेवाली भाषा ठीक नहीं है, उसी तरह मंत्रियों द्वारा अधिकारियों को धमकाना भी ठीक नहीं है। सभी नेताओं को राज्य के मुख्यमंत्री के बारे में संयमित भाषा का प्रयोग करने की आवश्यकता है। साथ ही, मंत्रियों को भी अधिकारियों को धमकाना और अवैध काम को बढ़ावा देना बंद करना चाहिए। इस संबंध में महाराष्ट्र में हद से ज्यादा अराजकता पैâल गई है। कोई किसी की नहीं सुनता और अपने तै पर नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाकर राजकाज करना चाहता है। कठोर अनुशासन के उपासक के रूप में जिनके कार्यों का ढोल पीटा जाता है, उन्हीं अजीत पवार ने अवैध ‘खनन’ उद्योग को संरक्षण देने के लिए करमाला के पुलिस उपाधीक्षक को खुलेआम धमकी दी और इस मामले ने राज्य की इज्जत चौराहे पर लाकर रख दी है। यह मामला सोलापुर जिले के माढा तालुका के कुर्डू गांव का है। जैसे ही जनता ने अवैध मुरुम खनन की शिकायत की, करमाला की पुलिस उपाधीक्षक अंजना कृष्णा ने इन चोरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। चोरों की इस मंडली के लोग अजीत पवार की पार्टी के कार्यकर्ता थे। उन्होंने आईपीएस अंजना कृष्णा के खिलाफ सीधे अजीत पवार से शिकायत की और पवार को फोन लगा कर फोन अंजना कृष्णा को दे दिया। इस दौरान अंजना कृष्णा और अजीत पवार के बीच जो
वाकयुद्ध
हुआ, वह महत्वपूर्ण है। पवार ने सीधे तौर पर धमकी देते हुए कहा, ‘हमारे लोगों के खिलाफ कार्रवाई बंद करो। वरना मैं तुम्हारे खिलाफ एक्शन लूंगा।’ अजीत पवार ने कहा, ‘मैं राज्य का उप मुख्यमंत्री हूं। क्या तुम मुझे नहीं जानती?’ असल में अजीत पवार उसी चोर, बाबा जगताप, जिस पर पुलिस ने कार्रवाई की थी, के फोन से आईपीएस अधिकारी को धमकाते हैं और अपनी पार्टी के गुनहगार कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए कहते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री और देश के कैबिनेट सचिवों को इस पर ध्यान देना चाहिए। पवार खुद को अनुशासित मानते हैं, लेकिन उन्होंने अनुशासनहीन काम करके हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित की है और अपने अन्य सहयोगियों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस खुद उनके ७०,००० करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले पर हमला बोल चुके हैं। फिर भी अजीत पवार उन्हीं मोदी की कृपा से फडणवीस मंत्रिमंडल में शामिल हैं। पवार बीच-बीच में अनुशासन के नाम पर गुर्राते रहते हैं। अजीत पवार ने हाल ही में ऐसे निर्देश और मार्गदर्शन दिए थे, ‘अनुशासनहीन और अवैध काम करनेवालों को टायर में उल्टा लटकाकर पीटा जाएगा,’ लेकिन माढा में मुरुम मामले में पवार खुद अवैध, आपराधिक काम को संरक्षण दे रहे हैं तो फिर बारामती के किस चौक पर श्री पवार ‘टायर’ पर उल्टा लटकेंगे? पुणे में एक सरकारी कार्यक्रम में अजीत पवार ने गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव इकबाल सिंह को हड़काया और कहा, ‘हम जिन कामों के बारे में कहते हैं, वे सार्वजनिक कार्य हैं। हम व्यक्तिगत कामों के लिए नहीं कहते।’ क्या अजीतराव, करमाला के उपाधीक्षक को बताया गया अवैध कार्य ‘सार्वजनिक’ की श्रेणी में आता है? यदि ऐसा है, तो ‘जीआर’ को जारी कीजिये कि महाराष्ट्र में
सभी अवैध कार्य
सार्वजनिक कार्यों की श्रेणी में आते हैं? महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार व्याप्त है, लेकिन राज्य का उप मुख्यमंत्री ही भ्रष्टाचार को कानूनी संरक्षण दिलाने के लिए धमकियां देता है। अब पता चला है कि इस मामले के वायरल होने के बाद, अजीतदादा के ‘उस’ आदमी के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में मामले दर्ज किए गए हैं। मामला तो अजीत पवार के खिलाफ भी दर्ज होना चाहिए। सरकारी काम में दखल कर एक आईपीएस अधिकारी को अवैध काम करवाने की धमकी दी थी। अगर कानून सबके लिए एक जैसा है तो मंत्रियों के खिलाफ भी उसी कानून के तहत मामला दर्ज होना चाहिए। वाकई, क्या महाराष्ट्र में सचमुच कानून का राज है? अगर जिस तरह की धमकियां वगैरह अजीत पवार द्वारा पुलिस उपाधीक्षक अंजना कृष्णा को दी गई हैं, वैसा पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, कर्नाटक, झारखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में हुआ होता तो भाजपाई यह स्यापा करते हुए कि ‘कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो गई है ऽऽऽ’ सड़कों पर अपनी छातियां पीटने का कार्यक्रम कर रहे होते। लेकिन महाराष्ट्र में तो सब कुछ कितना शांतिपूर्ण है! एकदम शांत! मानो अजीत पवार ने उस पुलिस अधिकारी को धमकाया नहीं, बल्कि फोन पर गायत्री मंत्र का जाप किया है। इन लोगों ने राज्य के प्रशासन की ऐसी की तैसी कर रखी है। लोकतंत्र में प्रशासन का बहुत महत्व है। प्रशासन आज लोकतंत्र का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। मंत्रियों को अवैध गतिविधियों को ‘ना’ कहना चाहिए और प्रशासकों को भी लगातार नकारात्मक घंटियां बजाना रोक देना चाहिए, तो राज्य ठीक से चलेगा, लेकिन मोदी के राज्य में तो सब खेल ही निराला है। भ्रष्टाचार खत्म करने का बीड़ा उठाने वाले प्रधानमंत्री मोदी को महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री द्वारा धमकाए जानेवाले मामले में कम से कम खुद के कान तो उमेठ लेने चाहिए!
