मुख्यपृष्ठस्तंभउड़ता तीर : ‘मोहन’ के ‘टाइगर स्टेट’ की सच्चाई!

उड़ता तीर : ‘मोहन’ के ‘टाइगर स्टेट’ की सच्चाई!

प्रमोद भार्गव

मध्य प्रदेश में चल रहे मानव-बाघ संघर्ष और अवैध शिकार एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं, क्योंकि यह राज्य देश में ‘टाइगर स्टेट‘ कहा जाता है। बाघों की निरंतर बढ़ती संख्या इनके संरक्षण और सुरक्षा के लिए चुनौती बन रही है। अतएव वन विभाग को सुरक्षा के साथ संवेदनशीलता की भी जरूरत है, क्योंकि अब इनके आवास और प्रजनन के क्षेत्र केवल बाघों के लिए आरक्षित उद्यान नहीं रह गए हैं। ये अपना क्षेत्र विस्तृत कर रहे हैं।
चिंतित करते आंकड़े
प्रदेश में वर्तमान में बाघों की संख्या ८५० से लेकर ९०० के बीच है। उम्मीद की जा रही है कि २०२६ में होनेवाली बाघ-गणना में ९५० से अधिक बाघ प्रदेश के वन प्रांतरों में हो सकते है, लेकिन चिंता की बात है कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, २०२५ के छह माह के भीतर २९ बाघों की मौत हो चुकी है। यानी औसतन प्रतिमाह पांच बाघ या तो प्राकृतिक मौत मरे है या फिर पेशेवर शिकारियों ने उनका शिकार किया है।
हाल ही में शिवपुरी से लगे श्योपुर से तीन बाघों की हड्डियों के साथ तीन आरोपियों को स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स ने पकड़ा है। इनमें से एक बाघिन टी-१ शिवपुरी के माधव राष्ट्रीय उद्यान की बताई जा रही है। इस बाघिन की करीब १ वर्ष से जानकारी नहीं मिल रही है, जबकि इसके गले में आईडी कॉलर डली हुई है। इस मामले में शिवपुरी के उद्यान से लगे ग्राम भीमपुर से पकड़े गए मुख्य आरोपी सोजीराम मोगिया ने स्वीकार किया है कि उसने जहर देकर एक बाघ को मारा है। हालांकि, वनसंरक्षक उत्तम शर्मा प्रमाण के अभाव में बाघिन का शिकार करना स्वीकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन बाघिन किस स्थल पर है, इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं है। सौजीराम का २५० बीघा वनभूमि पर अवैध कब्जा भी है, जो उद्यान की सीमा से लगा है।
हाल ही में पीएम ने बाघ परियोजना के ५० साल पूरे होने के अवसर पर कर्नाटक के मैसूर में बाघों की नई गणना रिपोर्ट-२०२२ जारी की थी। हालांकि, यह संख्या और ज्यादा भी हो सकती है, क्योंकि यह गिनती केवल बाघ परियोजना क्षेत्रों में लगे कैमरों में कैद हुए बाघों की, की गई थी। यह दुर्लभ प्राणी एक समय लुप्त होने के कगार पर पहुंच गया था, तब १ अप्रैल १९७३ को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बाघ परियोजनाओं के जरिए बाघ संरक्षण के मजबूत उपाय किए थे। दुनिया की कुल आबादी के ७५ प्रतिशत बाघ अकेले भारत में हैं। देश की सभी बाघ परियोजनाओं में ७५,००० वर्ग किमी क्षेत्र बाघों के लिए सुरक्षित है। दुनिया का महज २.४ प्रतिशत भू-भाग हमारे पास है, जबकि जैव-विविधता के संरक्षण में हमारा योगदान आठ प्रतिशत है। भारत की कुल आबादी के करीब ८५० बाघ मध्य प्रदेश की धरती पर विचरण कर रहे हैं इसीलिए अब मध्य प्रदेश ‘बाघ राज्य‘ (टाइगर स्टेट) कहलाता है। बाघ संरक्षण भारत सरकार और राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। संवेदना और सह-अस्तित्व के लिए प्रोत्साहित करनेवाली हमारी सांस्कृतिक विरासत ने बाघ परियोजना की सफलता में अहम् भूमिका निभाई है।
बाघों की संख्या संदिग्ध!
बीती सदी में जब बाघों की संख्या कम हो गई तब मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में पैरों के निशान के आधार पर बाघ गणना प्रणाली को शुरुआती मान्यता दी गई थी। ऐसा माना जाता है कि हर बाघ के पंजे का निशान अलग होता है और इन निशानों को एकत्र कर बाघों की संख्या का आकलन किया जा सकता है। कान्हा के पूर्व निदेशक एचएस पवार ने इसे एक वैज्ञानिक तकनीक माना था, लेकिन यह तकनीक उस समय मुश्किल में आ गई, जब ‘साइंस इन एशिया‘ के मौजूदा निदेशक के उल्लास कारंत ने बंगलुरु की वन्य जीव संरक्षण संस्था के लिए विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में बंधक बनाए गए बाघों के पंजों के निशान लिए और विशेषज्ञों से इनमें अंतर करने के लिए कहा। इसके बाद पंजों के निशान की तकनीक की कमजोरी उजागर हो गई और इसे नकार दिया गया। इसके बाद ‘कैमरा ट्रैपिंग‘ का एक नया तरीका पेश आया, जिसे कारंत की टीम ने शुरुआत में दक्षिण भारत में लागू किया। इसमें जंगली बाघों की तस्वीरें लेकर उनकी गणना की जाती थी। ऐसा माना गया कि प्रत्येक बाघ के शरीर पर धारियों का प्रारूप उसी तरह अलग-अलग है, जैसे इंसान की उंगलियों के निशान अलग-अलग होते हैं।
यह एक महंगी आकलन प्रणाली थी। पर यह बाघों के पैरों के निशान लेने की तकनीक से कहीं ज्यादा सटीक थी। इसके तहत वैâप्चर और री-कैप्चर की तकनीकों वाले परिष्कृत सांख्यिकी उपकरणों और प्रारूप की पहचान करनेवाले सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके बाघों की विश्वसनीय संख्या का पता लगाने की शुरुआत हुई। इस तकनीक द्वारा गिनती सामने आने पर बाघों की संख्या नाटकीय ढंग से घट गई थी, जो अब बढ़ रही है। हालांकि, बढ़ते क्रम में बाघों की गणना को हमेशा पर्यावरणविदें ने संदिग्ध माना है, क्योंकि आर्थिक उदारवाद के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्राकृतिक संपदा के दोहन की छूट जिस तरह से दी जा रही है, उसी अनुपात में बाघों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हो रहे हैं। खनन और राजमार्ग विकास परियोजनाओं ने बाघों की वंश वृद्धि पर अंकुश लगाया है। इन परियोजनाओं को प्रचलन में लाने के लिए चार गुना मानव बसाहटें बाघ आरक्षित क्षेत्रों में बढ़ी हैं। नतीजतन, मानव और बाघों के बीच संघर्ष बढ़ा है। केंद्र व राज्य सरकारों की नीतियां भी खनन परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही हैं। पन्ना में हीरा खनन परियोजना, कान्हा में बॉक्साइट, राजाजी में राष्ट्रीय राजमार्ग, ताड़ोबा में कोयला खनन और उत्तर प्रदेश के तराई वन क्षेत्रों में इमारती लकड़ी माफिया बाघों के लिए जबरदस्त खतरा बने हुए हैं। इसके बावजूद खनिज परियोजनाओं के विरुद्ध बुलंदी से आवाज न राजनीतिक संगठनों की ओर से उठ रही और न ही वन अमले की तरफ से? हां वन अमले की बर्बरता और गोपनीयता जरूर वैसी ही बनी चली आ रही है, जो फिरंगी हुकूमत के जमाने में थी। अंग्रेजों से विरासत में मिली इस शैली में बदलाव अभी तक वन अमला लाया नहीं है। इस कारण बाघों की मौतें भी बढ़ रही हैं, जबकि राष्ट्रीय उद्यानों, वनकर्मियों और वन आंवटन में निरंतर वृद्धि हो रही है। प्रत्येक आरक्षित उद्यान को २० से २६ करोड़ रुपए दिए जाते हैं। आशंकाएं तो यहां तक हैं कि बाघों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए बताई जाती है, ताकि इनके संरक्षण के बहाने बरस रही देशी-विदेशी धनराशि नौकरशाही का हिस्सा बनती रहे।
शिकार बनते बाघ!
वर्तमान में चीन में बाघ के अंग और खालों की सबसे ज्यादा मांग है। इसके अंगों से यहां पारंपरिक दवाएं बनाई जाती हैं और उसकी हड्डियों से महंगी शराब बनती है। भारत में बाघों का जो अवैध शिकार होता है, उसे चीन में ही तस्करी के जरिए बेचा जाता है। बाघ के अंगों की कीमत इतनी अधिक मिलती है कि पेशेवर शिकारी और तस्कर बाघ को मारने के लिए हर तरह का जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं। बाघों की दुर्घटना में जो मौतें हो रही हैं, उनका कारण इनके आवासीय क्षेत्रों में निरंतर आ रही कमी है। जंगलों की बेतहाशा हो रही कटाई और वन-क्षेत्रों में आबाद हो रही मानव बस्तियों के कारण भी बाघ बेमौत मारे जा रहे हैं।
पर्यटन के लाभ के लिए उद्यानों एवं अभ्यारण्यों में बाघ देखने के लिए जो क्षेत्र विकसित किए गए हैं, उससे इन क्षेत्रों में पर्यटकों की अवाजाही बढ़ी है, नतीजतन बाघ एकांत तलाशने के लिए अपने पारंपरिक निवास क्षेत्र छोड़ने को मजबूर होकर मानव बस्तियों में पहुंचकर बेमौत मर रहे हैं। बाघ संरक्षण विशेष क्षेत्रों का जो विकास किया गया है, वह भी उसकी मौत का कारण बन रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र में बाघ का मिलना तय होता है। बाघों के निकट तक पर्यटकों की पहुंच आसान बनाने के लिए बाघों के शरीर में रेडियो कॉलर आईडी लगाए गए हैं, वे भी इनकी मौत का प्रमुख कारण हैं। सीसीटीवी कैमरे भी इनको बेमौत मार देने की सूचना का आधार बन रहे हैं। दरअसल, कैमरे के चित्र और कॉलर आईडी से इनकी उपस्थिति की सटीक जानकारी वनकर्मियों के पास होती है। तस्करों से रिश्वत लेकर वनकर्मी बाघ की उपस्थिति की जानकारी दे देते हैं। नतीजतन, शिकारी बाघ को आसानी से निशाना बना लेते हैं।
अप्रत्यक्ष व अप्रामाणिक तौर से यह सत्य सामने आ चुका है कि बाघों के शिकार में कई वनाधिकारी शामिल हैं, इसके बावजूद जंगल महकमा और कुलीन वन्य जीव प्रेमी वनखंडों और उनके आसपास रहनेवाली स्थानीय आबादी को वन्यप्राणी संरक्षण से जोड़ने की कोशिश करने की बजाय भोले-भाले आदिवासियों पर झूठे मुकदमे लादने और उन्हें वनों से बेदखल करने की कोशिशों में लगे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सदियों से वनों में आदिवासियों का बाहुल्य उनकी प्रकृति और प्राणी से सह-अस्तित्व की जीवन शैली ही ईमानदारी से वन और वन्य जीवों के लिए सुरक्षा व संरक्षण का मजबूत तंत्र साबित हो सकता है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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