लोकतंत्र निष्प्राण सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर पड़ा है। न्याय देवता उसमें प्राण फूंकने के बजाय खुद ही ‘बचाओ, बचाओ’ चिल्ला रहे हैं। चीफ जस्टिस भूषण गवई ने राय व्यक्त की कि यदि दलबदल और गद्दारी के मामले इसी तरह बढ़ते रहे तो देश का लोकतंत्र सचमुच खतरे में पड़ जाएगा, लेकिन चीफ जस्टिस के ऐसे बयानों से पनपने वाली ‘उम्मीद’ के दिन अब खत्म हो गए हैं। क्योंकि महाराष्ट्र को चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष की मनमानी का कड़वा अनुभव रहा है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विधायकों की खरीद-फरोख्त और दलबदल व दल तोड़ने का समर्थन करते रहे हैं। अब मुद्दा यह है कि तेलंगाना में बीआरएस पार्टी के दस विधायक दल-बदल करके कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। वे एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुने गए और मेंढक की तरह दूसरी पार्टी में कूद पड़े। साढ़े तीन साल पहले महाराष्ट्र में जो हुआ, कमोबेश वही तेलंगाना में भी हुआ। फर्क बस इतना है कि ये विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। यदि वे जनता पार्टी में शामिल हो जाते तो अमित शाह के सुझाव के अनुसार, पूरी बीआरएस पार्टी और उसका आधिकारिक चुनाव चिह्न इन अलग हुए विधायकों को दे दिया जाता और ये गद्दार भी शेखी बघारते रहते कि ‘हमारी पार्टी ही असली है’। जब महाराष्ट्र में इस प्रकार लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं तब सर्वोच्च न्यायालय असहाय भाव से लोकतंत्र की चीखें सुन रहा था। भारत के चुनाव आयोग ने अलग हुए यानी गद्दारों के हाथों में मूल शिवसेना पार्टी चिह्न समेत सौंपने का घृणित कार्य किया और इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार अपील करने के बावजूद न्याय का देवता अंधा, बहरा और गूंगा बना रहा। पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने टूटे गुट के प्रतोद को अवैध घोषित कर दिया। उन्होंने राज्यपाल के हस्तक्षेप और सभी कार्रवाइयों को गलत ठहरा कर मामले को आगे के निर्णय के लिए विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर सेवानिवृत्त हो गए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अलग हुए गुट की सभी गतिविधियों को अवैध घोषित करने के बाद भी, विधानसभा अध्यक्ष ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को महीनों तक टाला और सुप्रीम कोर्ट की सभी टिप्पणियों को नजरअंदाज करते हुए अलग हुए गुट और गद्दारों को मान्यता दे दी। यह लोकतंत्र के लिए आपातकाल जैसा ही
काला दिन
रहा। दरअसल, ऐसे मामलों में निष्पक्ष फैसला देने की जिम्मेदारी विधानसभा अध्यक्ष की होती है, लेकिन अगर विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उस संवैधानिक कुर्सी पर बैठा हुआ व्यक्ति दल-बदल करके उस पद पर पहुंचा है तो उससे स्वतंत्र फैसले की उम्मीद कैसे की जा सकती है? दूसरी बात, चूंकि महाराष्ट्र में विधानसभा अध्यक्ष नार्वेकर भाजपा के टिकट पर चुने गए थे और पार्टी आलाकमान के आदेशों का पालन कर रहे थे इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं ही थी कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करेंगे। अत: विधानसभा में फूट को दलीय फूट मानकर उन्होंने लोकतंत्र को कलंकित कर दिया। विधायकों और सांसदों का अलग होना एक अलग मामला है, विधानसभा का मामला है। जिसके चलते सरकार गिर सकती है, लेकिन संविधान के ५२वें संशोधन की दसवीं अनुसूची विधायकों के अलग होने के कारण विधानसभा अध्यक्ष को पार्टी और चुनाव चिह्न के साथ सौदा करने का अधिकार नहीं देती है। बावजूद इसके, विधानसभा अध्यक्ष संविधान की छाती पर खड़े होकर संविधान को रौंदते रहे और सर्वोच्च न्यायालय उस अन्यायपूर्ण फैसले के विरुद्ध तारीखों का खेल खेलता रहा। यह खेल तीन-साढ़े तीन साल से चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में तीन मुख्य न्यायाधीश बदले जा चुके हैं, लेकिन महाराष्ट्र में हुए असंवैधानिक दलबदल, शिवसेना पार्टी और चुनाव चिह्न पर कोई फैसला नहीं हो सका। हर नया चीफ जस्टिस लोकतंत्र पर सूखी चिंताएं व्यक्त करता है, लेकिन उनके दरवाजे पर पड़ा महाराष्ट्र का निष्प्राण लोकतंत्र उन्हें विचलित नहीं करता। अब तेलंगाना में लोकतंत्र को लेकर चिंताओं ने सर्वोच्च न्यायालय को विचलित कर दिया है। क्या इससे सचमुच कुछ लाभ होगा? या फिर तेलंगाना के मामले का हाल ‘ढाक के तीन पात’ वाला होगा। सभी ‘सर्वोच्च’ न्यायाधीश लोकतंत्र और संसद के बारे में बड़ी-बड़ी बातें बोलकर थोड़ी-सी हलचल पैदा कर देते हैं। इससे लोकतंत्र की मूर्छित अवस्था समाप्त नहीं होती। तेलंगाना में दलबदल के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से पुरानी शराब नई बोतल में डाल दी है। गद्दारी यानी दलबदल एक राष्ट्रीय मुद्दा है। अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो
लोकतंत्र की जड़ें कमजोर
हो जाएंगी। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि मौजूदा दलबदल विरोधी कानून पर पुनर्विचार की जरूरत है। हम मुख्य न्यायाधीश की चिंता समझ सकते हैं, लेकिन अगर चुनाव आयोग संसद में बने एक मजबूत दलबदल विरोधी कानून की धज्जियां उड़ा रहा है और केंद्र में ऐसे लोग बैठे हैं जो पार्टी तोड़नेवालों को बढ़ावा दे रहे हैं तो क्या किया जा सकता है? महाराष्ट्र के मामले में लोकतंत्र को बेड़ियों में जकड़कर भेड़ियों के हवाले कर दिया गया है। इसे कैसे रोका जा सकता है? तेलंगाना के मामले में, सुप्रीम कोर्ट का कहना है, ‘जिन विधायकों की अयोग्यता की मांग की जा रही है, उनके खिलाफ कार्रवाई ‘लंबी’ नहीं खिंचनी चाहिए। अगर कोई विधायक कार्यवाही में देरी करने की कोशिश करता है तो उस विधायक के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करनी होगी।’ सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिका को विधानसभा सत्र के दौरान लंबित रखना ‘ऑपरेशन का सफल हो जाना, लेकिन मरीज का ऑपरेशन टेबल पर ही मर जाना’ जैसा होगा और सुप्रीम कोर्ट ऐसा नहीं होने देगा। हमारा कहना साफ है, विधानसभा अध्यक्ष ऐसे मामलों में ‘पार्टी’ बन जाते हैं और अपने राजनीतिक आकाओं की मर्जी से फैसला सुनाते हैं इसलिए विधानसभा अध्यक्ष को ऐसे निर्णय लेने का पूरा अधिकार देना किसी जल्लाद को काम सौंपने जैसा है। लोकतंत्र की जरा भी परवाह न करते हुए, ये जल्लाद लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि विधानसभा अध्यक्ष ने तेलंगाना के गद्दार विधायकों को उनकी अयोग्यता याचिकाओं के संबंध में सात महीने तक भी नोटिस क्यों नहीं भेजा। यदि मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह ईमानदारी से मानते हैं कि इससे दलबदल विरोधी कानून की उपयोगिता कमजोर हो रही है तो यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे अपने दरवाजे पर गिरे लोकतंत्र को संजीवनी दें। केवल शब्दों के बाण चलाने से कोई फायदा नहीं है। एक ही बार में महाराष्ट्र में थोक में दलबदल हुए। इनका पैâसला विधानसभा चुनाव से पहले सुनाया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। अब फिर से सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व शिवसेना पार्टी और चुनाव चिह्न संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई की तारीखों से खेल रहा है। फिर संविधान, कानून और लोकतंत्र के मूल्य कैसे जिंदा रहेंगे? अगर लोकतंत्र के नाम पर जल्लादों का खेल शुरू हो गया है तो इसके लिए हमारी न्यायपालिका जिम्मेदार है! मुख्य न्यायाधीश महोदय, देश आपकी ओर बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है।
