बड़े जोर-शोर के साथ विकास का बहुप्रचारित गुजरात मॉडल दिन-ब-दिन ढह रहा है। पहलगाम से लेकर दिल्ली तक, यह ढहना जारी है, लेकिन इस मॉडल की कमजोरी गुजरात में ही सामने आई है। कल, भारत ने वडोदरा-आणंद को जोड़ने वाले पुल के ढहने की ‘लाइव’ तस्वीर देखी। इस पुल हादसे में ट्रक, टैंकर, कारें बह गर्इं और दस से ज्यादा लोग बह गए। मोरबी पुल से वडोदरा तक पुल का ढहना और बहना जारी है। मानो इतना ही काफी नहीं था, इसी बीच अहमदाबाद में एयर इंडिया का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। २४३ लोग मारे गए। अब, जबकि गुजरात के सुपुत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व भ्रमण पर थे, तभी ‘वडोदरा’ में पुल ढह गया। नरेंद्र मोदी कल तक इसी वडोदरा संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे थे। अब वे वाराणसी से सांसद हैं। उस वाराणसी की सड़कों में भी ‘कुएं’ जितने गड्ढे हैं। मोदी ‘गुजरात मॉडल’ का सपना दिखाकर वाराणसी में जीते थे। इस सपने की धज्जियां खुद गुजरात में ही उड़ गर्इं। महिसागर नदी पर बना पुल ढह गया। इस बात पर खूब चर्चा हो रही है कि यह पुल पुराना था। अगर पुल पुराना था तो फिर इसकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? अगर यह बहुत पुराना था, तो नया पुल क्यों नहीं बनाया गया? क्या गुजरात मॉडल वाले यह नहीं समझते कि इस हादसे में निर्दोष लोग मारे गए? यह गुजरात सरकार की कार्यकुशलता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। सरकार को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि राज्य का सबसे ऊंचा पुल दो टुकड़ों में टूटने जितना ‘खतरनाक’ हो गया था या फिर इस बात का अंदाजा होने के बावजूद
लापरवाही
बरती गई। अगर अंदाजा होता, तो पुल पर यातायात बंद कर दिया जाता। लेकिन चूंकि वहां की पूरी सरकार ‘गुजरात मॉडल’ के भरोसे पर चल रही थी, इसलिए यातायात जारी रहा और बुधवार को पुल के साथ यह भरोसा भी टूट गया। भले ही मान लिया जाए कि दुर्घटनाएं बोलकर नहीं होती, लेकिन यह तो एक तरह से पल्ला झाड़ना है। स्थानीय विधायक को अंदाजा था कि जो पुल दुर्घटनाग्रस्त हुआ है, वह पिछले कुछ सालों में कमजोर हो गया था और इस पर आवाजाही खतरनाक हो सकती है। इसके लिए एक नए पुल की मांग भी की गई थी। सरकार का कहना है कि उसने नए पुल के लिए २१२ करोड़ रुपए का फंड भी मंजूर कर दिया है और एक सर्वेक्षण भी हो चुका है। तो अगर यह सब हुआ था, तो घोड़े कहां अटके थे? प्रधानमंत्री मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ की अनगिनत ‘परिकथाएं’ पिछले ढाई दशकों से रंगाकर सुनाई जाती रही हैं। बुधवार के पुल हादसे ने उन ‘परिकथाओं’ के रंगों को एक बार फिर से कुरेद दिया। तीन साल पहले गुजरात के ही मोरबी में हुए भीषण पुल हादसे ने गुजरात मॉडल की पोल खोल दी थी। उस समय हुक्मरानों ने हादसे का ठीकरा पुल का रखरखाव और मरम्मत करने वाली कंपनी के माथे फोड़ दिया था और पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी। मोरबी पुल हादसे में १४१ से ज्यादा
निर्दोष लोगों की मौत
हो गई थी। वह पुल १४० साल पुराना था। अब ढहा हुआ गंभीरा पुल केवल ४५ साल पुराना था, लेकिन यह दो टुकड़ों में ढह गया। अंग्रेजों द्वारा बनाया गया मोरबी हिलता पुल १४० साल तक चला। मोदी के तथाकथित गुजरात मॉडल द्वारा बनाया गया गंभीरा पुल के ४५ साल में ही दो टुकड़े हो गए! यह पाप केवल उन लोगों के लिए है जो गुजरात मॉडल के लिए अपनी पीठ थपथपाते हैं। आपके २१२ करोड़ रुपए के प्रावधान और सर्वेक्षण का क्या फायदा? यदि गुजरात मॉडल दूसरों से अलग होता, तो यह कमजोर पुल ‘प्रावधान और सर्वेक्षण’ के कागजी घोड़े में नहीं फंसता और निर्दोष लोगों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। वही सरकारी उदासीनता जिसके कारण पिछले महीने पुणे जिले में कुंडमाला पुल ढह गया, वही सरकारी उदासीनता है जिसके कारण तीन साल पहले गुजरात में मोरबी चल पुल दुर्घटना हुई और अब वडोदरा में गंभीरा पुल ढह गया। ‘गुजरात मॉडल’ के पांव भी मिट्टी के निकले। प. बंगाल में एक पुल गिरने पर प्रधानमंत्री मोदी ने ममता बनर्जी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने संभावना व्यक्त करते कहा था कि यह हादसा ‘ऐक्ट आफ प्रâाड’ है। तो बुधवार को उनके ही गुजरात में हुए पुल हादसे पर मोदी का क्या कहना है? क्या मोदी यह कहने की हिम्मत करेंगे कि यह भी ‘ऐक्ट ऑफ प्रâॉड’ है? मोदीजी, आपका गुजरात मॉडल भी गंभीरा पुल जितना ही कमजोर निकला है। अब तो मान लीजिए कि यह पुल नहीं, बल्कि ‘गुजरात मॉडल’ ढहा है!
