पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आते ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपने असली रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। पांच राज्यों के चुनाव होने तक मोदी ने आर्थिक बोझ ढोया। अब वह बोझ जनता पर डालकर मोदी खुद लंबे विदेश दौरे पर निकल गए हैं और जाते-जाते उन्होंने जनता को मुफ्त की सलाह दी है, ‘अगले कुछ महीने विदेश यात्राएं टालें, बेवजह विदेशी मुद्रा न उड़ाएं।’ आप यह जनता से कहते हैं और खुद विदेशी मुद्रा लुटाते हुए विदेश निकल जाते हैं, यह क्या तमाशा है? जनता र्इंधन की बचत करे, देश संकट में है, ऐसी दुहाई देना और खुद यूएई, स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली जैसे देशों में ‘हवा बदलने’ के लिए जाना, यह बेईमानी है। मोदी कहते हैं कि जनता को त्याग वगैरह करना चाहिए। खाड़ी युद्ध का झटका भारत को लगा है। उसकी कीमत जनता ‘राष्ट्रसेवा’ समझकर चुकाए, ऐसी मोदी की अपेक्षा है, लेकिन मोदी खुद राष्ट्रसेवा की कोई भी कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं। सोना न खरीदें, विदेश जाने का नाम न लें, पेट्रोल-डीजल की बचत करें, उसके बजाय रेलवे और मेट्रो के धक्के खाते हुए सफर करें, खाने का तेल कम इस्तेमाल करें, हो सके तो ‘वर्क प्रâॉम होम’ करें, ऐसा प्रधानमंत्री कहते हैं, लेकिन पांच राज्यों के चुनाव प्रचार में मोदी ने राष्ट्रसेवा के ये गंभीर मुद्दे उठाए ही नहीं। मोदी और उनके चमचे कह रहे थे कि वैश्विक युद्ध के बावजूद हमने भारतीय जनता को कोई आंच नहीं आने दी। मगर ये चुनाव खत्म होते ही मोदी ने जनता को ‘राष्ट्रकार्य’ के पाठ पढ़ाए हैं और मूर्ख जनता इन कष्टों को सहते हुए खुद को राष्ट्रकार्य में झोंक देगी। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के घर और दुकानें जलाने के राष्ट्रकार्य की शुरुआत हो ही चुकी है। उसमें कल जब खाड़ी
युद्ध की आंच
देश को और ज्यादा झुलसाने लगेगी, तब हिंदू-मुसलमानों के विवाद पर पेट्रोल छिड़का जाएगा। वर्तमान में यही राष्ट्रसेवा का प्रतीक बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल और असम जीतकर जनता पर ‘भार’ लादने का लाइसेंस ही प्राप्त कर लिया है और जनता बोझ ढोने वाला गधा बनने को तैयार है। यह गधागीरी ही हिंदुत्व और देशभक्ति मान लिया गया है। मूल रूप से मोदी की नीतियों के कारण देश की आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा गई है। डॉलर के मुकाबले रुपया सौ के करीब पहुंच गया है। मोदी का आर्थिक नियोजन विफल रहा है। इसलिए लोगों को भ्रमित कर वे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। कोविड काल में थालियां बजवाकर बीमारी भगाने का अनोखा फालतू कार्यक्रम उन्होंने जनता को दिया। आश्चर्य है कि उन्होंने इस बार ऐसा प्रयोग क्यों नहीं किया। र्इंधन संकट टालने के लिए, गैस की किल्लत पर काबू पाने के लिए उनसे थालियां बजवाने की अपेक्षा थी। मोदीभक्त जनता घंटा, थाली, चम्मच वगैरह लेकर तैयार थी, लेकिन मोदी विशेष विमान से विदेश दौरे पर निकल गए, जिससे जनता ने यह अवसर खो दिया। पांच राज्यों के चुनाव जीतने के लिए मोदी और उनकी पार्टी ने सैकड़ों करोड़ उड़ाए। अनगिनत चार्टर्ड विमान, चॉपर्स, रोड शो और रैलियों पर पैसा और र्इंधन खर्च किया गया। सरकारी खजाने पर इसका बोझ पड़ा। मोदी को तब मितव्ययिता की समझ क्यों नहीं आई? फिर मोदी के इस मितव्ययिता के गुब्बारे में उन्हीं के नेता सुई चुभा रहे हैं। मध्य प्रदेश के एक भाजपा नेता सौभाग्यसिंह ठाकुर महाशय ने मोदी की मितव्ययिता का ‘पाठ’ दूसरे ही दिन फाड़कर फेंक दिया। मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभालने के लिए इन महाशय ने उज्जैन से भोपाल तक का सफर फूलों की मालाओं से सजी ५० महंगी गाड़ियों के काफिले के साथ किया। मोदी के आह्वान को उनके ही लोग इस तरह
ठेंगा दिखा
रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी, उनकी पार्टी और उनके नेता अपने सुख चैन से कोई समझौता नहीं करते, लेकिन वे चाहते हैं कि जनता ऐसा समझौता करे। वे खुद सोने का मुकुट पहनेंगे, लेकिन संदेश दे रहे हैं कि जनता अपनी बेटी की शादी में रत्तीभर सोने का मंगलसूत्र भी न खरीदे। ईरान-इजरायल और अमेरिका का युद्ध एक वैश्विक संकट है, यह तब पता चल गया था जब ईरान पर पहला बम गिरा, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को इस वैश्विक संकट की भनक इतनी देर से लगी, क्योंकि उन्हें पश्चिम बंगाल और असम का युद्ध जीतना था। पश्चिम बंगाल जीतने के बाद मोदी ने कई राज्यों में विजयोत्सव मनाया। अपनी कर्मभूमि यानी वडोदरा में भी उन्होंने यह जश्न मनाया। वहां दो किलोमीटर लंबे भव्य रोड शो का आयोजन किया गया था। गाडा सर्कल से हवाई अड्डे तक सैकड़ों गाड़ियों का काफिला उसमें शामिल था। क्या इन गाड़ियों में र्इंधन के बजाय नर्मदा का पानी भरा था? मोदी ने चार दिन पहले गंगा एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया। समारोह में भीड़ जुटाने के लिए तीन हजार सरकारी वाहनों से लोगों को लाया गया। जनता को धर्म की भांग पिलाकर प्रधानमंत्री मोदी यह सब कर रहे हैं। अभिनेता और सांसद कमल हासन ने कल ही एक दो-टूक राय व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘जब तक जर्मनी पूरी तरह बर्बाद नहीं हुआ, तब तक वहां की जनता को हिटलर के हर काम और नौटंकी में देशभक्ति ही दिख रही थी।’ आज भारत की वही स्थिति है। देश बर्बादी के कगार पर खड़ा है, फिर भी ‘मोदी… मोदी… मोदी…’ के नारे सुनाई दे रहे हैं। देशभर से करोड़ों पत्र राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री कार्यालय जाने चाहिए, मोदी के इस ढोंग को रोकने के लिए!
