-सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं सीमित, निजी क्षेत्र में जा रहे रोगी
-गंभीर रोगों ने मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों की कमर तोड़ी
सुनील ओसवाल / मुंबई
महाराष्ट्र में आम नागरिकों की जेब पर स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। दवाखानों, दवाइयों, मेडिकल टेस्ट और इलाज पर होने वाला खर्च पिछले छह वर्षों में करीब ५० प्रतिशत तक बढ़ गया है। महंगाई, निजी अस्पतालों की बढ़ती फीस, महंगे डायग्नोस्टिक टेस्ट और लगातार बढ़ रहे गंभीर रोगों ने मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों की आर्थिक कमर तोड़ दी है।
सरकारी आंकड़ों और विभिन्न सर्वेक्षणों से सामने आया है कि शहरी ही नहीं, ग्रामीण इलाकों में भी इलाज का खर्च तेजी से बढ़ा है। दवाइयों की कीमतों में बढ़ोतरी, ब्लड टेस्ट, स्वैâनिंग और अन्य जांचों के बढ़े हुए शुल्क के कारण नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है। कई परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा अब केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और वैंâसर जैसे दीर्घकालीन रोगों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे मरीजों को लंबे समय तक दवाइयों और नियमित जांचों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे मासिक चिकित्सा खर्च बढ़ गया है। दूसरी ओर, सीमित स्वास्थ्य बीमा कवरेज के कारण अधिकांश लोगों को इलाज का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में बढ़ती भीड़ और सीमित सुविधाओं के चलते नागरिक निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। वहीं निजी अस्पतालों में इलाज के बढ़े हुए शुल्क ने आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
गंभीर बीमारी से परिवार भी संकट में
गंभीर बीमारियों, ऑपरेशन और लंबे इलाज के दौरान मरीजों के साथ उनके परिवारों को भी आर्थिक और मानसिक दबाव झेलना पड़ रहा है। दवाइयों, जांच, यात्रा, अस्पताल में रहने और कामकाज प्रभावित होने से मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की आर्थिक व्यवस्था चरमरा रही है।
बढ़ते स्वास्थ्य खर्च पर विशेषज्ञों की चिंता
चिकित्सा विशेषज्ञों ने बढ़ते स्वास्थ्य खर्च को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बदलती जीवनशैली, प्रदूषण, तनाव और बीमारियों का देर से पता चलना नागरिकों को लंबे इलाज की ओर धकेल रहा है। यदि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आम नागरिकों के लिए इलाज कराना और अधिक कठिन हो सकता है।
