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संपादकीय : प्रधान गए; बड़ा प्रधान भी जाएगा

भारतीय युवाओं के असंतोष का विस्फोट हो गया। उस विस्फोट में मोदी की सरकार पूरी तरह हिल गई। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान उस विस्फोट के पहले शिकार बने। ‘मोदी कभी झुकता नहीं, वे अजेय हैं’ की इस तरह उकेरी गई शिलालेख में पूरी तरह दरारें आ गई हैं। ३०-३५ दिनों से ‘जंतर-मंतर’ पर छात्रों का जोरदार आंदोलन चल रहा था। अभिजीत दीपके ने अमेरिका से आकर कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना की। ‘नीट’ परीक्षाओं के पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाई। उस चिंगारी का रूप भीषण आग में बदल गया। सोनम वांगचुक द्वारा शुरू किए गए अनशन ने उस आग में नैतिकता की समिधा डाल दी। इन कॉकरोचों के आगे क्या झुकना, यह मोदी सरकार का शुरुआत से ही रुख था। इतने बड़े-बड़ों को सत्ता के बल पर कुचल दिया, वहां ये कॉकरोच कौन हैं! सरकार इस घमंड में थी। कॉकरोचों पर पुलिस ने लाठियां चलार्इं, बंदूकें तानीं, लेकिन कॉकरोचों ने ‘जंतर-मंतर’ नहीं छोड़ा। धर्मेंद्र प्रधान को किनारे करके युवाओं ने प्रधानमंत्री मोदी को ही निशाना बनाना शुरू किया, तब मोदी ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर फिलहाल अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश की। प्रधान के इस्तीफे का सवाल ही पैदा नहीं होता, यह अंत तक कहा जाता रहा। ‘एन.डी.ए. में इस्तीफा लेने की रीत नहीं है’, ऐसी अहंकारी भाषा राजनाथ सिंह जैसे मंत्री करते रहे; लेकिन आखिरकार सरकार ने प्रधान का इस्तीफा ले ही लिया। प्रधान ने अपने त्यागपत्र में कहा है कि १० दिनों के घटनाक्रमों से वे अत्यंत व्यथित हुए हैं। ‘जंतर-मंतर’ के हालात का अनुचित लाभ देशविरोधी ताकतें न उठाएं, देश की एकता
अबाधित रहे
इसीलिए वे इस्तीफा दे रहे हैं। प्रधान के इस्तीफे के ये दावे झूठे हैं। १० दिनों के कौन से घटनाक्रमों से वे व्यथित हुए? गृह मंत्री अमित शाह के आदेश से दिल्ली पुलिस ने छात्रों पर बर्बर हमले किए। लड़के-लड़कियों के सर फोड़े। उस दुखद हादसे से वे व्यथित हुए हैं, ऐसा प्रधान ने कहीं नहीं कहा। देशभर के बच्चे मोदी-शाह के नाम का ढोल पीट रहे हैं। उससे वे व्यथित हुए होंगे, तो वह उनका व्यक्तिगत दुख का मौका है। हालात का गैरफायदा देशविरोधी ताकतें न उठाएं, इसलिए मंत्री पद का त्याग किया, यह कहना ‘जंतर-मंतर’ पर भड़के भारतीय असंतोष का अपमान है। कौन-सी देशविरोधी ताकतें उन्हें ‘जंतर-मंतर’ पर या देशभर के आंदोलन में दिखाई दीं? सोनम वांगचुक को चीन का एजेंट साबित करने का काम भाजपा ने इस दौरान किया। उसी भाजपा के मंत्री अस्पताल जाकर वांगचुक के हाथ-पैर जोड़ रहे थे। वांगचुक देश के युवाओं के भविष्य के लिए अनशन कर रहे थे। उनके साथ नेहा बोरा जैसे छात्र नेता अनशन कर रहे थे। ये देशविरोधी ताकतें हैं, ऐसा प्रधान को लगता है। फिर ऐसी देशविरोधी ताकतों के आगे मोदी सरकार को झुकने की जरूरत नहीं थी। सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जबरदस्ती लिया है और आखिरकार वे कहते हैं, देश की एकता अबाधित रहे इसलिए मैं कुर्सी छोड़ रहा हूं। प्रधान के
इस्तीफे का और राष्ट्रीय एकता
का कोई संबंध नहीं है। नीट पेपर लीक की वजह से २० लड़के-लड़कियों ने आत्म बलिदान दिया। उस बलिदान से असंतोष भड़का और देश एकजुट हुआ। प्रधान को यह मालूम नहीं होगा, तो वे शिक्षा मंत्री पद के कभी लायक ही नहीं थे, यही सच है। मोदी, शाह और उनकी सरकार ‘जंतर-मंतर’ पर एक मजाक का विषय बन गए। ३५ दिनों तक ‘जंतर-मंतर’ पर मोदी और उनकी सरकार की पूरी तरह चंपी चलती रही। युवाओं की रचनात्मकता और डिजिटल तकनीक को नए पंख लग गए थे। भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल पर तो लगभग ताला ही लग गया है। ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलन का यह एक बड़ा नतीजा है। सरकार अब पेपर लीक के खिलाफ एक नया विधेयक लेकर आ रही है। पेपर लीक करनेवालों को १० साल की जेल और १० करोड़ का जुर्माना लगाने वाला यह कानून वैसे तो पुराना ही है। सिर्फ जुर्माने और सजा के आंकड़ों में बदलाव किया गया। यह बिल यानी छात्रों और अभिभावकों को मूर्ख बनाने का धंधा है। अमित शाह ने छात्रों पर लाठीचार्ज करने का आदेश दिया। मौका पड़ने पर गोलियां चलाने का भी आदेश था। इसलिए अमित शाह को भी बख्शा नहीं जा सकता और ‘जंतर-मंतर’ पर हुए अमानवीय कृत्य के लिए प्रधानमंत्री मोदी को देश से माफी मांगनी ही पड़ेगी। धर्मेंद्र प्रधान गए इसलिए मामला खत्म हो गया, ऐसा नहीं होगा। ‘बड़ा प्रधान’ और उनका कामकाज देश के लिए घातक है। अमित शाह जैसे कारिंदे रक्त पिपासु हैं। असंतोष का विस्फोट उनके खिलाफ भी होगा।

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