राजन पारकर
‘‘मंत्री बदलते रहे, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की परीक्षा हर बार फेल होती रही। कुर्सियां बदलती रहीं, फाइलों के रंग बदलते रहे, मगर छात्रों की उत्तरपुस्तिका में हर बार लिखा गया-‘अगली बार फिर कोशिश कीजिए।”
देश में अगर किसी मंत्रालय ने पिछले बारह वर्षों में सबसे अधिक राजनीतिक उथल-पुथल देखी है तो वह शिक्षा मंत्रालय है। गृह मंत्रालय स्थिर रहा, विदेश मंत्रालय स्थिर रहा, रक्षा और वित्त मंत्रालय भी लगभग स्थिर रहे। लेकिन शिक्षा मंत्रालय ऐसा निकला, जहां मंत्री बदलते रहे और विवाद स्थायी कर्मचारी बनकर बैठे रहे। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या देश की शिक्षा व्यवस्था इतनी जटिल है कि कोई मंत्री उसे संभाल नहीं पाया? या फिर शिक्षा मंत्रालय केवल शिक्षा का नहीं, विचारधारा का युद्धक्षेत्र बन चुका है? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस मंत्रालय की असली परीक्षा किताबों से कम और विचारों से अधिक ली जाती रही है।
२०१४ में जब स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्रालय की कमान मिली, तब विरोधियों ने उनकी शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाए। लेकिन असली विवाद डिग्री नहीं था, बल्कि विश्वविद्यालयों की राजनीति, जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला प्रकरण जैसे मुद्दों ने मंत्रालय को लगातार सुर्खियों में रखा। शिक्षा कम, राजनीति ज्यादा दिखाई दी।
नई शिक्षा नीति का खाका तैयार होने लगा, लेकिन विवादों की स्याही इतनी गाढ़ी थी कि नीति पीछे रह गई और राजनीतिक बहस आगे निकल गई।
आखिरकार मंत्रालय बदल गया।
स्मृति ईरानी के बाद मंत्रालय प्रकाश जावड़ेकर के हाथ में आया। उनकी पहचान शांत स्वभाव वाले नेता की थी। लेकिन मंत्रालय का स्वभाव शांत कहां था? सीबीएसई पेपर लीक, छात्रों का विरोध, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल लगातार उठते रहे। हां, उनके कार्यकाल में एनटीए जैसी संस्था बनी, जिसे परीक्षा प्रणाली में सुधार का बड़ा कदम बताया गया।
विडंबना देखिए… जिस नीट को सुधार का प्रतीक बताया गया, वही बाद में परीक्षा विवादों के केंद्र में आ गई। नई शिक्षा नीति लागू हुई। सरकार ने इसे शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी क्रांति बताया। लेकिन उसी दौर में कोविड आया। जेईई और नीट परीक्षाओं को लेकर देशभर में विरोध हुआ। छात्र सड़क पर थे… सरकार परीक्षा पर अड़ी थी… अदालतें बीच में थीं… और शिक्षा फिर राजनीति के घेरे में खड़ी थी।
इसी दौरान उनके कुछ बयानों ने भी वैज्ञानिक समुदाय को चौंकाया और आलोचकों को सरकार पर निशाना साधने का मौका दिया। बीमारी के कारण उन्होंने पद छोड़ा।
धर्मेंद्र प्रधान – सबसे लंबा कार्यकाल, सबसे बड़ा आंदोलन
धर्मेंद्र प्रधान को संगठन का मजबूत चेहरा माना जाता था। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तेजी से लागू किया गया। मातृभाषा… भारतीय भाषाएं… त्रिभाषा फॉर्मूला… नई पाठ्यचर्या… राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं… सब कुछ तेजी से आगे बढ़ा। लेकिन दूसरी तरफ… परीक्षा प्रणाली पर लगातार सवाल उठते रहे।
नीट विवाद, भर्ती परीक्षाओं पर सवाल, छात्रों का आक्रोश और अंतत: देशव्यापी छात्र आंदोलन…
राजनीतिक दबाव इतना बढ़ा कि शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना पड़ा।
यह केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं था। यह उस व्यवस्था पर सवाल था जो छात्रों का विश्वास खो बैठी।
असल लड़ाई किताबों की नहीं, विचारधारा की?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक दशक में शिक्षा मंत्रालय केवल पाठ्यक्रम तय करने वाला विभाग नहीं रहा। यह विचारधारा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया।
किसे पढ़ाया जाए… क्या पढ़ाया जाए… इतिहास कैसे लिखा जाए…
विश्वविद्यालयों का चरित्र कैसा हो…
इन प्रश्नों पर जितनी राजनीति हुई, उतनी शायद शिक्षा की गुणवत्ता, शोध, शिक्षकों की कमी और सरकारी स्कूलों की हालत पर नहीं हुई। आलोचक कहते हैं कि विश्वविद्यालयों में वैचारिक नियुक्तियां बढ़ीं।
सरकार कहती है कि दशकों पुरानी असंतुलित व्यवस्था को सुधारा गया। सच्चाई जो भी हो… लेकिन यह तय है कि बहस शिक्षा से निकलकर विचारधारा तक पहुंच चुकी है।
बजट घटा… बहस बढ़ी
नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने की बात कही गई। लेकिन वर्षों से शिक्षा बजट के हिस्से को लेकर भी सवाल उठते रहे।
जब बजट कम हो… सरकारी विद्यालय संसाधनों के लिए संघर्ष करें… शोध संस्थान अनुदान की प्रतीक्षा करें… और विश्वविद्यालय नियुक्तियों के बजाय विचारधारा की बहसों में उलझ जाएं… तब केवल मंत्री बदलने से तस्वीर नहीं बदलती।
सत्ता के भीतर भी अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि शिक्षा केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं सुधरेगी।
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आने वाले समय में नया शिक्षा मंत्री केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र की विश्वसनीयता बहाल करने की सबसे कठिन चुनौती लेकर आएगा।
क्योंकि छात्र केवल डिग्री नहीं मांग रहे… वे भरोसा मांग रहे हैं। और जिस दिन युवा व्यवस्था पर विश्वास खो देता है… उस दिन किसी भी सरकार की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है।
इतिहास गवाह है… किताबों में लिखे अध्याय बदलना आसान है, लेकिन युवाओं के मन में लिखा अविश्वास मिटाना सबसे कठिन पाठ होता है।
