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३१ सीटों पर फिर चुनाव की तलवार?..एसआईआर पर सवालों से घिरा चुनाव आयोग… सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या हम नए चुनाव का आदेश दे सकते हैं?

-जीत के अंतर से ज्यादा वोटर सूची से बाहर…शीर्ष अदालत ने मांगा हिसाब, लेकिन अभी चुनाव रद्द करने का कोई आदेश नहीं

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का विवाद अब सिर्फ मतदाता सूची की तकनीकी कवायद नहीं रहा। मामला चुनाव नतीजों की वैधता तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि ३१ विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिनके नाम एसआईआर के दौरान सूची से हटाए गए। इसी दलील पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल किया, क्या ऐसी स्थिति में अदालत नए चुनाव का निर्देश दे सकती है? हालांकि, यह केवल अदालत में उठा सवाल है; ३१ सीटों पर चुनाव रद्द या दोबारा चुनाव कराने का कोई आदेश अभी नहीं हुआ है।
पश्चिम बंगाल में फिर होंगे चुनाव?
क्या बंगाल में फिर से विधानसभा चुनाव कराया जा सकता है? मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कटे नामों पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने याचिकाकर्ता के एक दलील के दौरान कहा कि क्या यह कोर्ट चुनाव का निर्देश दे सकता है? एसआईआर को लेकर चुनावी पारदर्शिता पर बहस अब और तीखी हो गई है। एक सीट पर महज ४०१ वोट की जीत और मतदाता सूची से ८,७८५ नाम हटने के आंकड़े ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा लंबित अपीलों का ब्यौरा मांगने के बाद चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ा है। सवाल सीधा है, वोटर लिस्ट साफ हुई या चुनावी गणित बदला?
बता दें कि बहस का सबसे विस्फोटक उदाहरण अदालत में एक ऐसी सीट का दिया गया, जहां हार-जीत का अंतर करीब ४०१ वोट बताया गया, जबकि ८,७८५ नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। यही गणित पूरे विवाद की धुरी बन गया है, अगर हटाए गए लोगों में बड़ी संख्या वैध मतदाताओं की थी, तो क्या चुनावी परिणाम प्रभावित हुआ? और यदि हुआ, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? मामला यहीं नहीं रुकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से एसआईआर के बाद बने अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों का विस्तृत ब्यौरा मांगा है। अदालत को बताया गया कि लगभग ३८.१ लाख अपीलें दाखिल हुर्इं, लेकिन इनमें करीब ३१ लाख अपीलें ऐसे नाम हटाने की मांग वाली हैं जो सूची में शामिल हैं, जबकि लगभग ७ लाख अपीलें अपने हटाए गए नाम वापस जोड़ने की हैं। अदालत ने संकेत दिया कि जिन लोगों का मतदान अधिकार छिना है, उनकी अपीलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस बहस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि को लेकर विपक्ष पहले भी निशाना साध चुका है, वे गृह और सहकारिता मंत्रालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और सहकारिता मंत्रालय में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अधीन सचिव रहे थे। लेकिन केवल इस पूर्व सेवा संबंध के आधार पर चुनावी गड़बड़ी साबित नहीं होती; इसके लिए ठोस दस्तावेजी और न्यायिक निष्कर्ष जरूरी हैं। यहीं वीडियो की बहस का सबसे अहम राजनीतिक बिंदु उभरता है, क्या एसआईआर मतदाता सूची की सफाई का अभियान था या उसने चुनावी मैदान ही बदल दिया? विपक्ष इसे मताधिकार और निष्पक्ष चुनाव का सवाल बना रहा है, जबकि अंतिम पैâसला आंकड़ों, अपीलों और अदालत की जांच से ही निकलेगा। फिलहाल ३१ सीटों पर दोबारा चुनाव तय नहीं हैं।
३८ लाख अपीलों ने बढ़ाई उलझन
एसआईआर के बाद करीब ३८.१ लाख अपीलें सामने आर्इं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग ३१ लाख अपीलें मतदाता सूची में शामिल नामों को चुनौती देने वाली और करीब सात लाख हटाए गए मतदाताओं द्वारा अपने नाम बहाल कराने से जुड़ी हैं। सुप्रीम कोर्ट अब इन मामलों का विस्तृत हिसाब चाहता है।
३१ सीटों का गणित
-टीएमसी का दावा: ३१ सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं से कम।
-एक उदाहरण: जीत का अंतर करीब ४०१, हटाए गए नाम ८,७८५।
-सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या ऐसी परिस्थिति में नए चुनाव का निर्देश दिया जा सकता है?
-अभी किसी सीट पर पुनर्मतदान या चुनाव रद्द करने का आदेश नहीं।

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