मुख्यपृष्ठनए समाचारकोस्टल रोड के नाम पर मुंबईकरों की आंखों में धूल!

कोस्टल रोड के नाम पर मुंबईकरों की आंखों में धूल!

-वर्सोवा-भायंदर प्रोजेक्ट की कछुआ चाल
-निरीक्षण के नाम पर सिर्फ जुमलेबाजी

सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की सड़कों पर रोजाना घंटों ट्रैफिक जाम में फंसने वाले मुंबईकरों को एक बार फिर सुगम और तेज सफर का सपना दिखाया जा रहा है। वर्सोवा से भायंदर को जोड़ने वाले महत्वाकांक्षी तटीय मार्ग यानी दहिसर-भायंदर लिंक रोड परियोजना को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। परियोजना की रफ्तार बेहद धीमी है और काम समय पर पूरा होने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी बीच अतिरिक्त महानगरपालिका आयुक्त अभिजीत बांगर ने परियोजना स्थल का निरीक्षण कर काम की समीक्षा की।
पर्यावरण की कीमत पर अरबों का प्रोजेक्ट
डबल एलिवेटेड रोड, खाड़ी और मैंग्रोव्ज क्षेत्र में खंभों पर सड़क, दो केबल-स्टेड ब्रिज और चार बास्केट ब्रिज जैसी विशाल संरचनाओं के जरिए परियोजना को आकार दिया जा रहा है। हालांकि, इस निर्माण के बीच पर्यावरणीय नुकसान को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मैंग्रोव क्षेत्र में निर्माण से प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका के बावजूद परियोजना की रफ्तार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं है।
३.९ किलोमीटर की सुरंग, काम की रफ्तार सुस्त
माइंडस्पेस, मालाड से चारकोप खाड़ी के बीच करीब ३.९ किलोमीटर लंबी जुड़वां सुरंगों का निर्माण इस परियोजना का अहम हिस्सा है। लेकिन सुरंग निर्माण की गति बेहद धीमी बताई जा रही है। सुरंग खोदने वाली टीबीएम मशीनों के दिसंबर तक पहुंचने का अनुमान है। इसके बाद मशीनों की असेंबली और खुदाई शुरू होने में भी अतिरिक्त समय लगने की आशंका है। ऐसे में परियोजना की समय-सीमा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शुरुआती काम में ही रेंग रही परियोजना
६५×४० मीटर के शाफ्ट और पाइलिंग का काम भी अभी शुरुआती चरण में ही दिखाई दे रहा है। दूसरी टीबीएम मशीन की असेंबली को लेकर जून तक काम पूरा करने के दावे किए गए थे, लेकिन परियोजना की मौजूदा स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। काम की यही रफ्तार रही तो निर्धारित समय में परियोजना पूरी करना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
जाम में पिसता मुंबईकर, दावों में दौड़ती परियोजना
एक तरफ करोड़ों-अरबों रुपए की परियोजना के जरिए मुंबई की यातायात व्यवस्था बदलने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुंबईकर आज भी घंटों ट्रैफिक जाम, खस्ताहाल सड़कों और धीमी रफ्तार यातायात व्यवस्था से जूझ रहे हैं। परियोजना में हो रही देरी का सीधा असर आम जनता के समय और रोजमर्रा की आवाजाही पर पड़ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि निरीक्षण और घोषणाओं से आगे बढ़कर परियोजना की रफ्तार कब तेज होगी और मुंबईकरों को वास्तव में राहत कब मिलेगी?

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