मुख्यपृष्ठस्तंभउड़ता तीर :  ट्रंप की सनक और जंग में झुलसता ‘हॉलिडे सीजन'

उड़ता तीर :  ट्रंप की सनक और जंग में झुलसता ‘हॉलिडे सीजन’

मनोज वार्ष्णेय

वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध के उन्माद ने वैश्विक पर्यटन उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और ट्रंप की अनिश्चित नीतियों ने दुनिया भर के पर्यटकों के मन में भय पैदा कर दिया है। यह बहस कि जीत किसकी हुई, शायद दशकों चले, लेकिन मिसाइलों और बमों के धुएं में पर्यटन की दुनिया इस कदर झुलस गई है कि इसे पटरी पर लौटने में कम से कम एक साल का समय लगेगा।
खाड़ी देशों और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन पर प्रहार
युद्ध का सबसे भयावह असर खाड़ी देशों, विशेषकर दुबई पर पड़ा है। प्रतिवर्ष १.५ करोड़ पर्यटकों की मेजबानी करनेवाले दुबई के पर्यटन स्थलों पर आज सन्नाटा है। हवाई यातायात बाधित होने और सुरक्षा चिंताओं के कारण युद्ध के ४० दिनों के भीतर दो लाख से अधिक बुकिंग रद्द हुई हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि युद्ध पूर्णत: समाप्त घोषित नहीं होता तो खाड़ी देशों को ४० से ५५ अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद का केंद्र बनने से र्इंधन की कीमतों में उछाल आया है, जिससे हवाई किराए आसमान छू रहे हैं। श्रीलंका और नेपाल जैसे देश, जो अपनी अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटन पर निर्भर हैं, र्इंधन संकट और पर्यटकों की कमी से जूझ रहे हैं।
भारतीय पर्यटन और चारधाम यात्रा पर प्रभाव
भारत में अप्रैल से अगस्त तक का समय धार्मिक पर्यटन का मुख्य सीजन होता है। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा और आदि वैâलाश यात्रा के लिए इस वर्ष पंजीकरण में ४० प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। वर्ष २०२५ में जहां १७ लाख पंजीकरण हुए थे, वहीं इस वर्ष १० अप्रैल तक यह संख्या केवल १४ लाख पर सिमट गई है। युद्ध के कारण उपजी गैस की किल्लत और आर्थिक अनिश्चितता ने होटल और ढाबा संचालकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा, मेडिकल टूरिज्म के लिए भारत आनेवाले विदेशी मरीजों की संख्या में भी भारी कमी आई है, जिससे राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा है।
प्रमुख पर्यटन केंद्रों में पसरा सन्नाटा
आगरा, जयपुर और दिल्ली जैसे शहर, जो हमेशा विदेशी पर्यटकों से गुलजार रहते थे, आज ‘पर्यटकों के अकाल’ से जूझ रहे हैं। कश्मीर, लेह-लद्दाख, शिमला और मनाली जैसे हिल स्टेशनों पर अप्रैल में बुकिंग के लिए मारामारी रहती थी, लेकिन अब स्थिति यह है कि एजेंसियां ‘नो लॉस, नो प्रॉफिट’ पर पैकेज देने को तैयार हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही एजुकेशन और विदेशी पर्यटन को प्रभावित किया था, अब खाड़ी के संकट ने इसे और विकट बना दिया है। पर्यटकों में डर है कि यदि वे विदेश यात्रा के दौरान फंस गए तो उनकी सुरक्षित वापसी चुनौतीपूर्ण होगी।
ट्रंप की नीतियां और भविष्य की अनिश्चितता
पर्यटन विशेषज्ञों और आम जनता का मानना है कि इस वैश्विक मंदी के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ‘बात पलटने’ की नीति और युद्ध के प्रति उनकी सनक बड़ी वजह है। सोशल मीडिया पर उनकी छवि ‘पर्यटन के कोरोना अंकल’ जैसी बन गई है, जिनकी वजह से लोग घरों में कैद होने को मजबूर हैं। भले ही वर्तमान में युद्ध विराम की स्थिति हो, लेकिन पर्यटकों में विश्वास की कमी है। जब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी शांति का भरोसा नहीं दिलाया जाता, तब तक पर्यटन उद्योग का पुनर्जीवित होना असंभव प्रतीत होता है।
(लेखक राजस्थान से प्रकाशित नवज्योति के पूर्व साहित्य संपादक हैं)

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