राजन पारकर
देश की जनता को बरसों तक एक ही कहानी सुनाई गई- ‘पेट्रोल महंगा है क्योंकि पिछली सरकार तेल बॉन्ड छोड़ गई थी!’ जैसे कोई पुराना पाप हो, जिसका प्रायश्चित आज का गरीब स्कूटरवाला कर रहा हो! अरे भैया, सवाल यह है कि अगर ऑयल बॉन्ड का पूरा बोझ ब्याज समेत तीन लाख करोड़ के आसपास था, तो जनता की जेब से चालीस लाख करोड़ रुपए क्यों निचोड़े गए? तेरह गुना ज्यादा टैक्स!
इतना टैक्स तो मुगलों ने भी लगाते समय दो बार सोचा होगा! जनता पूछ रही है – ‘तेल बॉन्ड चुकाए या पूरा हिंदुस्थान ही गिरवी रख दिया?’ कमाल की बात देखिए! २०१४ के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल ऐसे गिरा जैसे चुनाव के बाद नेता का सिद्धांत गिरता है। दुनिया में पेट्रोल सस्ता हुआ, लेकिन भारत में सरकार ने ऐसा हिसाब लगाया कि जनता को सस्ता तेल दिखा ही नहीं! कच्चा तेल नीचे, लेकिन एक्साइज ड्यूटी ऊपर!
सेस ऊपर! टैक्स ऊपर! और जनता का ब्लड प्रेशर सबसे ऊपर! सरकार ने पेट्रोल पंप को एटीएम बना दिया।
फर्क सिर्फ इतना था कि कार्ड जनता का था और पैसा सीधे खजाने में जा रहा था।
अब सुनिए जिन ऑयल बॉन्ड्स को लेकर रोज कांग्रेस को कोसा गया, वे सिर्फ कांग्रेस की खोज नहीं थे। पुराने बजट रिकॉर्ड बताते हैं कि शुरुआती दौर में बीजेपी सरकार के समय भी ऑयल बॉन्ड जारी हुए थे। हां, कांग्रेस ने २००४ के बाद उन्हें खूब बढ़ाया, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन फिर सवाल उठता है – अगर दोनों ने बॉन्ड निकाले, तो फिर नैतिकता का पेट्रोल पंप सिर्फ एक तरफ ही क्यों खुला? असल मुद्दा अब राजनीति नहीं, पारदर्शिता है। जनता जानना चाहती है – चालीस लाख करोड़ कहां गए? कितना पैसा सचमुच कर्ज चुकाने में लगा? कितना इंप्रâास्ट्रक्चर में गया? कितना सब्सिडी में गया? और कितना ‘राष्ट्रहित’ नाम के उस रहस्यमयी गड्ढे में समा गया, जहां हिसाब मांगो तो देशभक्ति का सर्टिफिकेट दिखाया जाता है? सबसे मजेदार बात तो यह है कि सरकार खुद कहती रही कि ऑयल बॉन्ड का बोझ २०२६ तक खत्म हो जाएगा। तो फिर सवाल यह है कि जनता को राहत कब मिलेगी?
या जनता सिर्फ टैक्स देने के लिए पैदा हुई है? आज हालत यह है कि आदमी बाइक में पेट्रोल कम और उम्मीद ज्यादा भरवाता है। नेताओं की भाषा में इसे ‘राजस्व संग्रह’ कहा जाता है। आम आदमी की भाषा में इसे कहते हैं – ‘जेब काटना!’ देशभक्ति के नाम पर जनता सब सह लेती है। लेकिन हर बार राष्ट्रवाद का ड्रम बजाकर पेट्रोल की कीमतें छिपाई नहीं जा सकतीं। क्योंकि अंत में जनता यही पूछती है – ‘साहब तेल महंगा था या नीयत?’
