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गेस्ट कॉलम :  आधी छोड़ सारी को धावै, आधी रहै न सारी पाव

रमन मिश्र

हाल ही में चाबहार पर जो अमेरिकी सैन्य हमले (Aग्rेूrग्वे) हुए हैं, वह भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए गंभीर स्थिति है। पहले जहां अमेरिका केवल चाबहार पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता था, वहीं जुलाई २०२६ (हाल ही में) अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण यह क्षेत्र सीधे हमलों की चपेट में आ गया है। अमेरिका द्वारा सैन्य कार्रवाई में पहली बार चाबहार शहर और उसके बंदरगाह ढांचे को निशाना बनाया गया। जुलाई के हमलों से पहले, मार्च २०२६ में भी अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने चाबहार के आसपास के इलाकों पर बमबारी की थी।
यह सैन्य हमला भारत की विदेश नीति और रणनीतिक निवेश के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। भारत ने चाबहार के ‘शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल’ के विकास में त्र्१२० मिलियन से अधिक का निवेश किया है। युद्ध क्षेत्र के इतने करीब होने से भारतीय संपत्ति और भविष्य के संचालन पर भारी खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी हमलों ने चाबहार को केवल एक आर्थिक या व्यापारिक मुद्दा न रखकर, सीधे एक सक्रिय युद्ध क्षेत्र (Aम्ूग्न ेंaर्r ैंदहा) में बदल दिया है, जिससे भारत मध्य एशिया और रूस (घ्र्‍एऊण् ण्दrrग््दr) तक पहुंचने का सपना फिलहाल और लंबा खिंच गया है। यह स्थिति नई दिल्ली के लिए एक बड़ी रणनीतिक परीक्षा की तरह है। अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार लटकने से ‘इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड’  जैसी भारतीय कंपनियों पर वित्तीय पेनल्टी और ब्लैकलिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है।
चाबहार को अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का मुख्य प्रवेश द्वार माना जा रहा था, जो भारत को मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ता। अमेरिकी कार्रवाई से वैश्विक लॉजिस्टिक्स कंपनियों और भारतीय निर्यातकों के मन में डर पैदा हुआ है, जिससे व्यापार की लागत ३० प्रतिशत और समय ४० प्रतिशत कम करने का जो सपना था, वह खटाई में पड़ता दिख रहा है।
चाबहार, पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर बंदरगाह से महज १४० किलोमीटर दूर है। भारत के लिए यह चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’  और पाकिस्तान को बाईपास कर मध्य एशिया तक पहुंचने का एक मजबूत भू-राजनीतिक काउंटरवेट (संतुलनकर्ता) था। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यदि भारत की भूमिका यहां कमजोर होती है तो ईरान में चीन का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
यह स्थिति भारत की विदेश नीति के लिए एक कठिन संतुलन बिंदु है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ ‘क्वॉड’ और द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों को मजबूत कर रहा है तो दूसरी तरफ उसे ईरान जैसे पारंपरिक मित्र देश के साथ अपने ऐतिहासिक और ऊर्जा-सुरक्षा संबंधों को भी बचाना है। वॉशिंगटन का दबाव भारत की इसी ‘रणनीतिक स्वायत्तता और वर्चस्व’ को चुनौती दे रहा है। इस परियोजना में अनिश्चितता आने से मध्य एशियाई देशों में भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता और उपस्थिति प्रभावित हो रही है। इस अमेरिकी कार्यवाही ने निश्चित रूप से भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक हितों और विस्तार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं पर पानी फेर दिया है। नई दिल्ली यदि अमेरिका की इन कथित कार्यवाहियों पर निषेध नहीं जाहिर करता है तो ईरान में दशकों की मेहनत से तैयार किया गया कूटनीतिक ठिकाना हाथ से निकल जाएगा।
‘आधी छोड़ सारी को धावै, आधी रहै न सारी पावै।’
इस समय यह कहावत इस भू-राजनीतिक संकट और इसमें भारत की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठती है।

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