बनावटी हैं लोग सभी,
दयावान दिखने की होड़ में।
बदहवासी में भागते फिरते,
जाने किस अंधी दौड़ में।
हर कोई खोया है यहाँ,
मुखौटों की इस भीड़ में।
न कोई अपना, न पराया,
सब उलझे अपनी पीड़ में।
मेला गज़ब है दुनिया का,
रिश्तों का भी खेल निराला।
मानो तो अनजान भी अपना,
न मानो तो सगा भी पराया।
मतलबपरस्ती में डूबे लोग,
स्वार्थ जिन्हें ही प्यारा है।
चापलूसी की हदें पार कर,
बेच दिया जिन्होंने ज़मीर सारा है।
झूठे दिखावे में हुए ऐसे अंधे,
रिश्तों का मोल न जाना है।
घर के बुजुर्गों को भी जिन्होंने,
अपनों के बीच पराया बनाया है।
कैसी विडंबना है जीवन की,
कैसा यह मानस का व्यवहार।
इंद्रजाल-सी इस दुनिया में,
मायावी चेहरों का भेद न पाया है।
मुनीष भाटिया
ऐरो सिटी,
मोहाली।
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