अनिल मिश्र / पटना
देश के दो अलग-अलग हिस्सों से आई हालिया तस्वीरों ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर बहस छेड़ दी है। एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर एक पुलिसकर्मी द्वारा पेलेट गन से फायरिंग करने का मामला सामने आया है, जिसमें छात्र घायल हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ बिहार के सिवान में स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस द्वारा एके-47 जैसे युद्धस्तरीय हथियार से फायरिंग करने की घटना ने सभी को स्तब्ध कर दिया है।
इन दोनों घटनाओं ने एक बड़ा और प्रासंगिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये आंदोलन या परिस्थितियां इतनी अनियंत्रित और हिंसक हो गई थीं कि पुलिस को पेलेट गन या एके-47 जैसे अत्यंत घातक हथियारों का सहारा लेना पड़ा?
दिल्ली का जंतर-मंतर देश का वह पारंपरिक स्थल है, जहां नागरिक और छात्र अपनी मांगों और विरोध को दर्ज कराने आते हैं। छात्र आंदोलन किसी भी जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा होते हैं। निश्चित रूप से किसी भी प्रदर्शन में शांति बनाए रखना जरूरी है, लेकिन निहत्थे छात्रों पर पेलेट गन का इस्तेमाल करना किस हद तक जायज है?
पेलेट गन जैसे हथियारों का इस्तेमाल आमतौर पर अत्यंत हिंसक और उग्र भीड़ को रोकने के लिए गैर-घातक विकल्प के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसके गंभीर और स्थायी दुष्परिणाम (जैसे आंखों की रोशनी जाना) सर्वविदित हैं। जब छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हों, तब संवाद और संयम की जगह पेलेट गन की छर्रों से जवाब देना पुलिस बल के आनुपातिक बल प्रयोग के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वहीं बिहार के सिवान की घटना और भी चिंताजनक है, जहां पुलिस द्वारा एके-47 से फायरिंग करने की बात सामने आई है। एके-47 एक ऑटोमैटिक असॉल्ट राइफल है, जिसका इस्तेमाल युद्ध या आतंकवाद विरोधी अभियानों में होता है, न कि आम नागरिकों या किसी स्थानीय तनाव को नियंत्रित करने के लिए।
मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के अनुसार, भीड़ नियंत्रण के लिए एक तय प्रक्रिया होती है। पहले चेतावनी, फिर लाठीचार्ज, आंसू गैस, वाटर कैनन और अत्यंत विकट परिस्थिति में पैर पर रबर बुलेट या नियंत्रित फायरिंग का प्रावधान होता है।
सिवान जैसी जगह पर एके-47 के इस्तेमाल की बात सामने आना यह दर्शाता है कि या तो पुलिस के पास भीड़ नियंत्रण की आधुनिक और सुरक्षित तकनीक की कमी है या फिर प्रशासनिक स्तर पर संयम की जगह अत्यधिक बल प्रयोग को प्राथमिकता दी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार पुलिस द्वारा इस्तेमाल किया गया बल हमेशा परिस्थिति के समानुपातिक होना चाहिए।
क्या वाटर कैनन, आंसू गैस या लाठीचार्ज जैसे पारंपरिक तरीकों से स्थिति को नहीं संभाला जा सकता था?
क्या हमारे पुलिस बल को उग्र परिस्थितियों में बिना घातक हथियारों के स्थिति नियंत्रित करने का पर्याप्त प्रशिक्षण मिल रहा है?
छात्रों पर पेलेट गन चलाना और सड़कों पर एके-47 लहराना नागरिकों में सुरक्षा के बजाय खौफ का अहसास पैदा करता है।
आंदोलन या विरोध प्रदर्शनों में यदि हिंसा होती है, तो कानून-व्यवस्था कायम करना पुलिस का पहला कर्तव्य है। लेकिन इसके लिए अपनाए गए साधन भी उतने ही न्यायसंगत होने चाहिए। छात्र देश का भविष्य हैं और आम नागरिक इस देश के मालिक हैं। जब पुलिस अपनी ही जनता पर पेलेट गन और एके-47 जैसी बंदूकों का रुख करती है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर आघात बन जाता है।
इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की सख्त जरूरत है, ताकि जवाबदेही तय की जा सके।
