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हनीफनामा : अनिल-नसीर सपनों से मंजिल तक!

हनीफ जवेरी

सपने देखना खासकर किशोरावस्था में बहुत स्वाभाविक बात है। उस उम्र में मन उम्मीदों से भरा होता है। बहुत से लोग सपने देखते हैं, लेकिन उन्हें सच करने का साहस और मेहनत बहुत कम लोगों में होती है। सपने से हकीकत तक पहुंचने का सफर आसान नहीं होता, लेकिन जब कोई अपना सपना पूरा कर लेता है, तो उसकी कहानी दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन जाती है।
निर्देशक अनिल शर्मा ने जब होश संभाला, तभी उन्होंने शशि कपूर के साथ फिल्म बनाने का सपना देख लिया था। किशोरावस्था में वे शशि के जबरदस्त प्रशंसक थे और उनकी हर फिल्म मथुरा के सिनेमाघरों में देखा करते थे। अनिल ने बहुत छोटी उम्र में ही यह तय कर लिया था कि उन्हें फिल्म निर्देशक बनना है। अनिल की ही तरह अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने भी फिल्मों में आने से पहले यह सपना देखा था कि वे किसी दिन एक अभिनेता के रूप में शायर मिर्जा गालिब का किरदार अवश्य निभाएंगे।
अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए अनिल मथुरा से मुंबई आए और सहायक निर्देशक के रूप में फिल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई से जुड़े। वहीं, एक अभिनेता के रूप में स्वयं को निखारने के लिए नसीरुद्दीन शाह ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रवेश लिया। एक तरफ अनिल शर्मा फिल्म निर्माण की बारीकियां सीख रहे थे, तो दूसरी तरफ नसीरुद्दीन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अभिनय की बारीकियां अपने गुरु इब्राहीम अलकाजी से सीख रहे थे। नसीर की नजर फिल्म इंडस्ट्री में हो रही गतिविधियों पर भी टिकी रहती थी। नसीरुद्दीन ने जब पत्र-पत्रिकाओं में यह समाचार पढ़ा कि गुलजार अभिनेता संजीव कुमार को शीर्षक भूमिका में लेकर फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ बनाने जा रहे हैं, तो गालिब के किरदार में खुद को देखने का उनका सपना टूटता नजर आया। और पूरी रात सो नहीं पाए। अगली सुबह उन्होंने गुलजार के नाम एक पत्र लिखा और उन्हें सूचित किया कि संजीव को लेकर ‘मिर्जा गालिब’ बनाना एक गलती होगी, क्योंकि उनके अनुसार संजीव किसी भी रूप में उस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं थे। नसीरुद्दीन का मानना था कि संजीव का शरीर मिर्जा गालिब के व्यक्तित्व से किसी भी तरह मेल नहीं खाता। उन्होंने यह भी लिखा कि संजीव को न तो उर्दू का ज्ञान है और न ही शायरी की समझ। नसीरुद्दीन शाह ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि गालिब की भूमिका के लिए गुलजार को कुछ वर्षों तक उनका इंतजार करना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार वही इस भूमिका को सबसे बेहतर ढंग से निभा सकते हैं।
संजीव कुमार पर अपनी पुस्तक एन एक्टर्स एक्टर लिखते समय मैंने गुलजार से नसीरुद्दीन के उस पत्र के बारे में पूछा था। इस पर गुलजार ने कहा कि उन्हें याद नहीं कि उन्होंने ऐसा कोई पत्र पढ़ा हो। संभव है कि प्रशंसकों के ढेर सारे पत्रों के बीच वह पत्र दबकर रह गया हो। गुलजार किसी कारणवश फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ शुरू नहीं कर सके। इधर नसीरुद्दीन शाह ने फिल्म ‘निशांत’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। वहीं अनिल शर्मा ने स्वतंत्र निर्देशक के रूप में फिल्म ‘श्रद्धांजलि’ से अपने करियर की शुरुआत की।
अनिल ने अपनी अगली फिल्म ‘बंधन कच्चे धागों का’ में अपने पसंदीदा अभिनेता शशि कपूर को लेकर अपना सपना साकार किया और धीरे-धीरे कई हिट फिल्में (हुकूमत,एलान-ए-जंग, गदर: एक प्रेम कथा, अपने, वीर, गदर २) देकर उन्होंने सफल निर्देशकों की सूची में अपना नाम दर्ज कराया। सन १९८८ में गुलजार ने नसीरुद्दीन शाह को लेकर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक `मिर्जा गालिब’ बनाया, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया। इस धारावाहिक ने नसीरुद्दीन शाह का गालिब का किरदार निभाने का सपना भी पूरा कर दिया। सपनों को हकीकत में बदलने वाले अनिल शर्मा और नसीरुद्दीन शाह जब फिल्म `तहलका’ के लिए एक साथ आए, तो उन्होंने बॉलीवुड में सचमुच तहलका मचा दिया।

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