राजेश विक्रांत
भारतीय इतिहास व समाज को पढ़ने समझने व उसकी व्याख्या करने में माहिर लेखक राज खन्ना की नई किताब “इंडिया अर्थात भारत” संविधान निर्माण से लेकर 2024 तक के भारत की राजनीतिक कहानी है जिसमें संविधान की नींव बी एन राव, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजभाषा हिंदी, सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, जनसंघ फिरोज गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, आपातकाल, जनता पार्टी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, राजीव गांधी, ज्ञानी जैल सिंह, वीपी सिंह का मंडल- कमंडल, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, एचडी देवेगौड़ा, लालू प्रसाद यादव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह के साथ भारतीय जनता पार्टी, जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा, सीताराम केसरी, सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, शरद पवार, मायावती, राहुल गांधी तथा वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े, किस्से- कहानियों व प्रसंगों को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है।
इंडिया अर्थात भारत के प्रथम अध्याय “संविधान विमर्श” में इंडिया अर्थात् भारत, गणतंत्र दिवस: 26 जनवरी ही क्यों? संविधान: मौलिकता का दावा नहीं, राष्ट्रपति प्रणाली या फिर संसदीय व्यवस्था? अकेले श्रेय लेना आंबेडकर को क्यों नहीं था स्वीकार? बेनेगल राव: संविधान की नींव, मुस्लिम पर्सनल लॉ और आंबेडकर, नेहरू और आंबेडकर, आंबेडकर और गांव, संविधान सभा: हिंदी का सवाल, संविधान सभा में भी व्हिप, संविधान सभा का पहला संशोधन जिसे थी सिर्फ लोकसभा की मंजूरी, राज्यपाल: शुरू से सवाल, सरदार पटेल और ब्यूरोक्रेसी, कार्यपालिका- न्याय पालिका: शुरुआती टकराव, विधायिका- न्यायपालिका का वो टकराव तथा राजेंद्र प्रसाद: राष्ट्रपति के अधिकारों का सवाल हैं तो दूसरे अध्याय “राजनीति” के तहत जनसंघ क्यों? पंडित नेहरू और पहला आम चुनाव, जीत के लिए सब जायज, फिरोज गांधी: संसदीय योद्धा, फिरोज के विरोथ से परेशान इंदिरा, लाल बहादुर शास्त्री: इलाहाबाद वापसी की थी तैयारी, वो खबर जिसने शास्त्री का प्रधानमंत्री चुना जाना आसान किया,
इंदिरा गांधी: सब पर भारी, राष्ट्रपति चुनाव: कभी पार्टी की चली, कभी पार्टी टूट गई, राष्ट्रपति और इमरजेंसी, इंदिरा इज़ इंडिया-इंडिया इज इंदिरा, जनता पार्टी की सरकार क्यों गिरी? प्रधानमंत्री जिन्हें संसद का सामना करने का मौका नहीं मिला, इंदिरा की वापसी: बेलछी, आजमगढ़, ऑपरेशन ब्लूस्टार; राजनीति की कीमत, राजीव गांधीः शानदार शुरुआत- दुखद अंत, शांति समझौता जिसकी भारत ने कीमत चुकाई तथा ज्ञानी जी; सरकार बर्खास्तगी को थे तैयार लेख हैं।
इंडिया अर्थात भारत के तृतीय अध्याय “दांव-पेंच” में उपचुनाव: बदलाव का संदेश, विश्वनाथ प्रताप: मंडल-कमंडल के दांव-पेंच, चंद्रशेखर: बेलाग-बेलौस, नरसिम्हा राव; अपने रूठे-गैर हुए मुरीद,
नरसिम्हा राव और बाबरी ध्वंस, विश्वनाथ प्रताप सिंह: नहीं… अब फिर प्रधानमंत्री नहीं ! का जी देवेगौड़ा… इसीलिए तुम्हें प्रधानमंत्री बनाया था का ! गुजराल को लालू ने बनाया गुर्जर यादव, अटल जी: मुश्किल सफर, अटल जी: पटाखा छोड़ना है, सबके अटल जी, अब्दुल कलाम : सपने जो सोने न दें, डॉ मनमोहन सिंह: खामोशी मेरी अच्छी,
नरेंद्र मोदी: सब मुमकिन तथा नरेंद्र मोदी: वही तेवर लेख हैं। चौथे अध्याय “आशा-निराशा” में भाजपा; जनता पार्टी में जनसंघ थी अछूत…! जगजीवन राम : तब राष्ट्रपति ने रास्ता रोका ! हेमवती नंदन बहुगुणा: गांधी टोपी उतार दी, सीताराम केसरी: अपमानजनक विदाई, सोनिया गांधी: प्रधानमंत्री बनने से क्यों किया इनकार ? लाल कृष्ण आडवाणी; पी.एम. इन वेटिंग पर विराम, जॉर्ज फर्नांडीज; द जाइंट किलर, मुलायम सिंह यादव : जमीनी राजनीति का योद्धा, नीतीश कुमार: कभी थे प्राइम मिनिस्टर मटेरियल, लालू यादव; अलग अंदाज, शरद पवार: भतीजा भारी, राहुल गांधी: संजीवनी की आस तथा मायावती: हार का सिलसिला लेख हैं।
पुस्तक में स्वतंत्र भारत की राजनीति के समस्त प्रस्थान बिंदुओं, युग, धारा, प्रवृत्तियों, उतार-चढ़ाव, दांव- पेंच, आशा व निराशा का उल्लेख किया गया है। लेखक राज खन्ना का किशोरावस्था से ही पत्रकारिता और लेखन से गहरा जुड़ाव रहा है। वह 5 दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता इतिहास, राजनीति व संविधान से जुड़े सवालों पर सतत अध्ययनशील हैं। सामयिक, राजनीतिक मसलों के साथ ही ऐतिहासिक विषयों पर निरंतर लिखते और प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। तथ्य- तर्क- तटस्थता उनके लेखन को अलग पहचान देते हैं। भाषा की रवानी और सरल सहज अंदाज में वह पाठक से सीधे जोड़ते हैं।
सुल्तानपुर के निवासी राज खन्ना की अपनी एक खास शैली है जो इतिहास जैसे गंभीर विषय को भी दिलचस्प तरीके से पेश करती है। दरअसल राज खन्ना इतिहास को तर्क, सिद्धांत व समझ के साथ एक निर्मम पर्यवेक्षक की तरह देखते हुए सच, झूठ या कल्पना के सकारात्मक पहलुओं को पाठकों के सामने रखते हैं इसलिए उनके लेखन में रोचकता है और सहजता भी। यही कारण है कि पाठकों को ‘इंडिया अर्थात भारत’ में कई ऐतिहासिक कहानियां तो मिलेगी साथ ही जाने अनजाने प्रसंगों से भी पाठकों का वास्ता पड़ेगा। इस पुस्तक में जो बेहद दिलचस्प प्रसंग है उनमें इंडिया अर्थात भारत नामकरण की दास्तान, 26 जनवरी को ही गणतंत्र दिवस क्यों, डॉ बाबासाहेब अंबेडकर को संविधान निर्माण का श्रेय अकेले लेना मंजूर नहीं था, देश के पहले आम चुनाव संबंधी आचार्य कृपलानी का अनुभव, फिरोज गांधी प्रसंग, इंदिरा गांधी- सब पर भारी, जनता पार्टी सरकार के पतन की अंतर कथा, एपीजे अब्दुल कलाम- सपने जो सोने ना दें, बहुगुणा ने जब गांधी टोपी उतार दी, नीतीश कुमार कभी प्राइम मिनिस्टर मटेरियल थे। ‘इंडिया अर्थात भारत’ को संधीश पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड लोनी, गाजियाबाद ने प्रकाशित किया है। पृष्ठ संख्या 272 है। मूल्य ₹500 है।
