मुख्यपृष्ठस्तंभकानून बनेंगे, लेकिन भरोसा कब लौटेगा?

कानून बनेंगे, लेकिन भरोसा कब लौटेगा?

बड़ा सवाल बार-बार पेपर लीक कैसे हुए?

उमन गुप्ता

संसद में परीक्षा प्रणाली, युवाओं के भविष्य और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर बहस जारी है। सरकार का दावा है कि नकल और पेपर लीक पर लगाम कसने के लिए कानूनों को और मजबूत किया जा रहा है। दूसरी ओर विपक्ष का सवाल है कि केवल नए कानून बना देने से क्या उन लाखों युवाओं का भरोसा लौट आएगा, जिन्होंने वर्षों तक परीक्षा रद्द होने, भर्ती अटकने और जांच लंबी खिंचने का दर्द झेला है?
यही सवाल आज देश के युवाओं के मन में सबसे बड़ा है। अगर व्यवस्था पहले से मौजूद थी तो फिर बार-बार पेपर लीक वैâसे हुए? यदि एजेंसियां सतर्क थीं तो गिरोह इतने लंबे समय तक सक्रिय वैâसे रहे? और यदि अब सख्ती की जा रही है, तो पहले हुई चूक की जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकार का पक्ष है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई है, गिरफ्तारियां हुई हैं और परीक्षा प्रक्रिया को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कार्रवाई केवल घटना के बाद होती है जबकि जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें पेपर लीक की नौबत ही न आए। यह बहस केवल शिक्षा की नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की भी है।
लाखों युवाओं के सपने हुए चूर
हर रद्द हुई परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के समय, मेहनत और सपनों पर भी असर डालती है। यही कारण है कि संसद के भीतर की बहस सड़क पर युवाओं की आवाज से जुड़ जाती है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार केवल कानून बनाने तक सीमित रहती है या भर्ती और परीक्षा प्रणाली में ऐसे स्थायी सुधार भी करती है, जिनसे आने वाले वर्षों में छात्रों का विश्वास वास्तव में मजबूत हो सके। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे मजबूत कानून वही माना जाता है, जिस पर जनता का भरोसा भी उतना ही मजबूत हो।

अन्य समाचार