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संपादकीय : पुराने बंद : नए शुरू… उद्योगों की दर्दभरी दास्तान

देश के छोटे-बड़े कारखाने तेजी से बंद हो रहे हैं। मध्यम स्तर के उद्योगों पर भी ताले लटक रहे हैं, जिससे हजारों नौकरीपेशा लोगों और मजदूर-कर्मचारियों पर बेरोजगारी की गाज गिर रही है। पिछले तीन वर्षों में देश की करीब १ लाख २१ हजार ८०५ एमएसएमई इकाइयां बंद हो गर्इं। एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग। इन उद्योगों को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाले और देश के निर्यात क्षेत्र में अहम योगदान देनेवाले इन लघु व मध्यम उद्योगों की कैसी दुर्दशा हुई है, इसके आंकड़े खुद सरकार ने सोमवार को संसद में पेश किए। इसके मुताबिक, २०२४ से २०२६ तक केवल तीन वर्षों के भीतर करीब सवा लाख के आस-पास छोटे और मध्यम स्तर के कारखाने या उद्योग बंद हो गए। उद्योग-धंधे बंद होने का यह आंकड़ा कम होने के बजाय पिछले १० वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। एक उद्योग बंद होता है तो उस इकाई में काम करनेवाले सौ-पांच सौ कर्मचारियों की आजीविका पर संकट आ जाता है। यहां तो तीन वर्षों में एक लाख से अधिक छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं। केवल तीन वर्षों में ही लाखों कर्मचारियों का रोजगार छिन गया। अकेले महाराष्ट्र में ही पिछले तीन वर्षों में एमएसएमई की २८,७६४ इकाइयां बंद हो गईं। इसके बाद तमिलनाडु में १४,१७६, गुजरात में ११,१५० और राजस्थान में ९,८८१ छोटे व मध्यम स्तर के उद्योग-व्यवसाय हमेशा के लिए बंद हो गए। एक तरफ केंद्र सरकार और
विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री
नए उद्योग-धंधे लाने के लिए दावोस समेत दुनियाभर के देशों के चक्कर काट रहे हैं तो दूसरी तरफ देश में जो उद्योग-व्यवसाय मौजूद हैं, वे बंद हो रहे हैं और रसातल में जा रहे हैं। उद्योग विकास की सरकारी नीति कितनी खोखली है, यह विसंगति इसी से साफ झलकती है। पिछले १० वर्षों में एमएसएमई क्षेत्र के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को शुरू करने के लिए सरकार ने ३५ लाख करोड़ रुपए से अधिक का ऋण उपलब्ध कराया। लेकिन बाजार की चुनौतियां, बढ़ती लागत और व्यवसाय की समस्याओं का सामना करने में उद्यमियों की विफलताओं के कारण इस क्षेत्र में उद्योग बंद होने का सिलसिला जारी है। उद्योगों पर ताले लगने से रोकने के उपाय करने के बजाय, उससे दोगुने नए उद्योग शुरू करके सरकार अपनी ही पीठ थपथपा रही है। अकेले महाराष्ट्र की बात करें तो पिछले तीन वर्षों में देश में सबसे ज्यादा ७५ लाख से अधिक नए उद्योगों का पंजीकरण और शिलान्यास हुआ और इसी दौरान २८ हजार से अधिक इकाइयां बंद भी हो गर्इं; लेकिन सरकार पीछे मुड़कर देखने को तैयार नहीं है। उल्टे ‘देखिए, हमने कैसे नए उद्योग शुरू किए!’ ऐसा सरकारी ‘ढिंढोरा’ पीटा जा रहा है। बंद पड़े कारखानों के
कितने लोन अकाउंट एनपीए
में चले गए, बैंकों का कितने करोड़ रुपए का कर्ज डूब गया, बंद हुई एमएसएमई इकाइयों के कारण कितने लोगों का रोजगार चला गया, इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है। बैंकों से समय पर और कम ब्याज दर पर कर्ज न मिलना, बड़ी कंपनियों को माल आपूर्ति (सप्लाई) करने के बाद उनसे बकाया पैसा मिलने में होनेवाली देरी और सरकारी विभागों से उत्पादों के बिलों का भुगतान अटकना जैसी वजहों से पनपने से पहले ही सूक्ष्म और लघु उद्योगों का ढांचा ढह जाता है। उन्हें सहारा देकर दोबारा खड़ा करने या उन बीमार उद्योगों को उबारने के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस उपाय होते नजर नहीं आते। ‘आप अपना खुद देख लें’ की इस नीति के कारण लघु उद्योग तो डूबते ही हैं, साथ ही बैंकों का कर्ज भी डूबता है और वहां काम करनेवाले हजारों युवाओं का रोजगार भी अचानक छिन जाता है। पिछले तीन वर्षों में देश के सवा लाख से अधिक उद्योग या कारखाने बंद हो चुके हैं। लाखों युवाओं का रोजगार चला गया है। केंद्र सरकार ने खुद ये आंकड़े अब लोकसभा में दिए हैं। हजारों करोड़ रुपए का विदेशी निवेश लाने और उससे हजारों नए उद्योग शुरू करके लाखों रोजगार पैदा करने के सरकारी दावों की यह पोल खोलता है। ‘पुराने बंद और नए शुरू’ जैसी उद्योगों की यह दर्दभरी दास्तान पिछले बारह वर्षों से देश में चल रही है। युवाओं के हाथों में रोजगार देने के बजाय उनके दिमाग में धार्मिक उन्माद भरनेवालों के राज में इसके अलावा और क्या हो सकता है?

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