हनीफ जवेरी
जब हम किसी खास व्यक्ति से प्रभावित होते हैं, तब मन ही मन यह इच्छा होती है कि हमें हमें उनके साथ काम करने का अवसर मिले। क्योंकि उनका काम और उनका स्वभाव हमें प्रभावित कर चुका होता है। लेकिन हम उनके काफी करीब रहने के बावजूद उनके साथ काम नहीं कर पाते और हमारी यह इच्छा अधूरी ही रह जाती है। ऐसा ही कुछ लेखक, निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन के साथ हुआ था।
५० के दशक में अपनी लिखी फिल्मों ‘मुनीमजी’ और ‘पेइंग’ गेस्ट की शूटिंग के दौरान नासिर हुसैन फिल्म के हीरो देव आनंद से काफी प्रभावित हुए। उनका सपना था कि एक दिन वह अपने निर्देशन में उन्हें लेकर फिल्म जरूर बनाएं।
जब फिल्मिस्तान के मालिक तोलाराम जलान ने उनका विषय सुनकर उन्हें फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ निर्देशित करने का मौका दिया तो उन्होंने देव के साथ फिल्म बनाने का पैâसला किया। लेकिन देव ने व्यस्तता का बहाना बनाकर फिल्म करने से इनकार कर दिया और उनकी जगह उस दौर के फ्लॉप अभिनेता शम्मी कपूर को लिया गया।
नासिर फिल्म की हीरोइन अमिता से भी खुश नहीं थे, जिसके कारण फिल्म पूरी होने से पहले ही उनका और तोलाराम जलान का मनमुटाव हो गया। और फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ के रिलीज होते ही नासिर हुसैन ने फिल्मिस्तान छोड़ दिया और फिल्मालय जॉइन कर लिया, जहां उन्हें फिल्मालय की पहली फिल्म ‘दिल देके देखो’ निर्देशित करने का मौका मिला।
नासिर हुसैन एक बार फिर फिल्म ‘दिल देके देखो’ की कहानी लेकर देव आनंद के पास गए। देव ने उन्हें टालने के लिए एक वादा किया और कहा कि जिस दिन तुम निर्माता बनोगे, उस दिन मैं तुम्हारे साथ फिल्म जरूर करूंगा। इस तरह ‘दिल देके देखो’ में एक बार फिर देव की जगह शम्मी कपूर को ले लिया गया।
वास्तव में देव आनंद को लगता था कि नासिर हुसैन एक लेखक के रूप में तो ठीक हैं, लेकिन फिल्म का निर्देशन करना अलग बात है। दूसरी ओर, शम्मी कपूर उन्हें अपने लिए लकी मानते थे, क्योंकि फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ से उन्हें सफलता मिली थी और उन्होंने नासिर के साथ एक और सुपरहिट फिल्म ‘दिल देके देखो’ दी।
अब नासिर हुसैन ने अपना खुद का होम प्रोडक्शन नासिर हुसैन फिल्म्स स्थापित किया और अपनी पहली फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ शुरू की। इसके लिए वे सबसे पहले अपने पसंदीदा अभिनेता देव आनंद से मिले। इस बार देव को अपना वादा याद था इसलिए वे प्रस्ताव को ठुकरा नहीं सके। नासिर की गर्लप्रâेंड आशा पारेख के साथ देव ने यह फिल्म कुछ बेदिली से की, लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट साबित हुई।
‘जब प्यार किसी से होता है’, के बाद उन्होंने फिल्म ‘फिर वही दिल लाया हूं’ बनाई। इस फिल्म में वे देव आनंद को नहीं ले सके, क्योंकि शशधर मुखर्जी का दबाव था कि वे उनके बेटे जॉय मुखर्जी के साथ ही फिल्म बनाएं।
नासिर पर एस. मुखर्जी का एहसान था, जिन्होंने उन्हें फिल्मालय के तहत फिल्म ‘दिल देके देखो’ दी थी। अब जब नासिर हुसैन ने फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ बनाने का पैâसला किया तो उन्होंने देव आनंद को लिया। लेकिन देव ने अपने भाई विजय आनंद को फिल्म निर्देशित करने के लिए दबाव डाला और नासिर को केवल निर्माता बनकर रहना पड़ा।
यहीं पर नासिर हुसैन को यह एहसास हुआ कि वास्तव में देव उनके निर्देशन में काम नहीं करना चाहते। इसी बात को लेकर दोनों के बीच ठंडी जंग शुरू हो गई। नतीजतन, कुछ ही दिनों की शूटिंग के बाद देव आनंद ने ‘तीसरी मंजिल’ छोड़ दी और एक बार फिर उनकी जगह शम्मी कपूर आ गए और यहीं से उन्हें आर.डी. बर्मन का साथ मिला, जो अंत तक कायम रहा।
