-पहले ही दिख जाएगा मधुमेह-किडनी का खतरा…आईआईटी मुंबई की बड़ी खोज
सामना संवाददाता / मुंबई
हिंदुस्थान में बढ़ते मधुमेह और उससे जुड़ी किडनी बीमारियों की दहशत के बीच अब उम्मीद की नई किरण जगी है। आईआईटी मुंबई के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो खून के एक कतरे पर विश्लेषण कर बता सकेगी कि किसी व्यक्ति में डायबिटीज या किडनी रोग का खतरा पनप रहा है। इस शोध में ‘मेटाबोलाइट्स’ के गहन विश्लेषण से ऐसे संकेत मिले हैं, जो बीमारी के प्रारंभिक चरण में ही खतरे का अलार्म बजा सकते हैं। यह अध्ययन अब तक का सबसे सटीक प्रयास माना जा रहा है। इस खोज को वैज्ञानिकों ने हिंदुस्थान के १० करोड़ डायबिटीज मरीजों के लिए नई उम्मीद बताया है।
बता दें कि आईआईटी मुंबई और हैदराबाद के उस्मानिया मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने मिलकर मधुमेह से संबंधित किडनी रोगों को शुरुआती अवस्था में पहचानने का एक महत्वपूर्ण शोध किया है। इस अध्ययन में रक्त में मौजूद ऐसे सूक्ष्म रासायनिक घटक की पहचान की जा रही है, जो मधुमेह से होने वाली जटिलताओं की पहले से चेतावनी दे सकते हैं। इसके जरिए मरीजों का समय पर उपचार संभव हो सकेगा। इस नई खोज से डायबिटीज के कारण होने वाले किडनी रोगों के खतरे का पहले से पता चल जाएगा। आईआईटी मुंबई के प्रो. प्रमोद वांगिकर, उस्मानिया मेडिकल कॉलेज के डॉ. राकेश कुमार सहाय और डॉ. मनीषा सहाय के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। पुणे स्थित क्लैरिटी बायोसिस्टम्स इंडिया के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर शोधकर्ताओं ने यह जांच की कि क्या रक्त में मौजूद कुछ मेटाबोलाइट पैटर्न्स से उन मरीजों की पहचान की जा सकती है, जिन्हें डायबिटीज से जुड़ी किडनी जटिलताओं का खतरा है। शोधकर्ताओं ने इसके लिए ‘मेटाबोलोमिक्स’ यानी रक्त में मौजूद सूक्ष्म अणुओं के अध्ययन की तकनीक का उपयोग किया। अध्ययन के निष्कर्ष जुलाई २०२५ में ‘जर्नल ऑफ प्रोटिओम रिसर्च’ में प्रकाशित हुए हैं।
देश में मधुमेह के सबसे अधिक मरीज
हिंदुस्थान में लगभग १० करोड़ वयस्क टाइप-२ डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि १३ करोड़ लोग ‘प्री-डायबिटिक’ अवस्था में हैं। पश्चिमी देशों की तुलना में हिंदुस्थानियों में कम उम्र और कम बीएमआई पर ही डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही उन्हें किडनी रोग जैसी जटिलताओं का भी अधिक खतरा होता है इसलिए भारतीय मरीजों में मेटाबोलिक पैटर्न्स का अध्ययन बेहद आवश्यक है। इस पृष्ठभूमि में यह शोध भारतीयों के लिए अत्यंत लाभदायक साबित हो सकता है।
ऐसे हुआ परीक्षण
उस्मानिया अस्पताल के ५२ स्वयंसेवी व्यक्तियों से रक्त के नमूने लिए गए। इनमें १५ स्वस्थ व्यक्ति (कंट्रोल ग्रुप), २३ टाइप-२ डायबिटीज मरीज और १४ डायबिटिक किडनी रोगी शामिल थे। परीक्षण के लिए लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री और गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी दो उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया। कुल ३०० मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण किया गया।
