प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं, `मैं देश नहीं बिकने दूंगा’, लेकिन उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने वाली एकमात्र सरकारी कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) के निजीकरण ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। १४५ करोड़ रुपए की नेटवर्थ वाली इस कंपनी को मात्र १२१ करोड़ रुपए में मेसर्स स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को बेच दिया गया। साल १९७८ में स्थापित आईएमपीसीएल ४० एकड़ सरकारी भूमि पर संचालित हो रही थी। कंपनी के पास १,२०० प्रकार की औषधियां बनाने का लाइसेंस था और वर्तमान में वह ५७५ आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाओं की आपूर्ति केंद्रीय अस्पतालों, अनुसंधान संस्थानों और विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों को कर रही थी।
निजीकरण के पैâसले से कर्मचारियों में भारी नाराजगी है। कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार ने उनके रोजगार और भविष्य की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है। यही वजह है कि ट्रेड यूनियन आईएमपीसीएल कर्मचारी संघ ने एक जून से धरना और विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा की है। दिलचस्प बात यह है कि इस पैâसले पर भाजपा के कुछ नेताओं ने भी आपत्ति जताई है। कर्मचारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में सौंप रही है, जबकि कर्मचारियों के हितों की अनदेखी की जा रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह विनिवेश है या फिर सरकारी संपत्तियों को औने-पौने दामों पर बेचने की प्रक्रिया?
